Lakkad baggghey
लकड़बघ्घे । (एक अकविता वस यूँही)
खुदा के वेश में
जन्मते शैतान
रक्त बीज
जहरीले बरषाती कीड़े
या लकडबघ्घे
जीवित माँ भारती का
मांस नौच नौच कर खाते
अल्लाहो अकबर गाते
नरपिशाच
क्या खुदा वाकई मर गया है?
इन शैतानों को जन्म देने के बाद
या फिर
डर कर छुप गया है
किसी खोह मैं
इन रक्त पिपासु लकड़बघ्घों के डर से
थरथर कांपता
सर के बाल नौचता हुआ खुदा .....
किस मनहूस घडडी में
उसने रच दिया
इन मानवता के रक्त के प्यासे भेड़ियों को
जो कर रहे हैं लहू लुहान
मासूम बच्चों के खून से
लाचार औरतों की आबरू
तार तार
स्वर्ग में
नब्बे हूरों और
बहत्तर लौंडों के साथ अप्राकृतिक वासना की चाह में
मार डाला खुदा को
बेबजह बे कसूर
हिजड़ों के वेश में
बैठे हुये शासनाध्यक्ष
कापुरुष
कायर
पुरुषो अधम
राज कर रहा
प्रजातंत्र के गधा तंत्र पर
निरंकुश नौकर तंन्त्र
अपने ही देश में
वेगाने हुये
निराश्रित शरणार्थी
लुटी पिटी औरतें
धरती के स्वर्ग पर
काबिज हैं लकड़बघ्घे
रक्त पिपासु, नराधम
और हिजड़ा प्रजातन्त्र
और स्यूडो सैक्युलेरिज्म
प्रजा की पीठ पर सवार
बेईमान नौकर तन्त्र
आशा की कोई किरन नहीं दूर तक
बस निविड़ अंधकार
निराशा का चीत्कार
हाहा कार
शरणार्थी शिविरों में
सिमटी दुबकी जिन्दगियां
अपने ही घर में घुसे
अट्टहास करते
क्रूर लकडडबघ्घों को ताकती
लाचार निगाहें
धरती का स्वर्ग
आज
धरती का नर्क है
जहां नाचते हैं
खुदा के वेश में
शैतान नंगे होकर । । 6-04— 2013 ग्वालियर ।
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