गुरुवार, 28 सितंबर 2017

रविवार, 3 सितंबर 2017

EK KHOI HUI SI KAVITA


EK KHOI HUI SI KAVITA 

एक खोई हुई सी कविता
वैठी है 
समय के धुँध में ,
यादों की डोर पकड़े
सपनों के अंतहीन छोर पर

दिल के लम्बे हाथ...
अनन्त सरल रेखा वन कर
चाहते हैं छू  लेना उसे

ओह  ! अनन्त !
पूर्णता की राह में
पूर्णँ शाँति के शून्य से
निकल कर
परम् शाँति के शून्य में 
विलीन होता हुआ
रेखा गणित के विंदु सा 
 असितित्वहीन मैं ......!

..._ k_vikramSingh
8-4-2014 GhatiGaon 
   Gwalior 

Photo curtsy Kamlesh Chauhan "Gauri "

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

समर्पण

सचमुच 
मेरे शब्द पिघल उठ्े हैं 
तुम्हारी कलम की आँच से  
तपिश और जिजीविषा से 
हार कर
देखो 
हथियार जमीन पर रख दिये हैं मैने
पूर्ण समर्पण 
  विक्रम २३ -८-२०१७

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

सोमवार, 21 अगस्त 2017

तुम्हारे क़दमों की आहट

ह्दय के तारों को झंकृत करती
तुम्हारे कदमों की आहट
हवाओं और फिजांओं में घुली खुशबू 
तुम्हारे वहाँ होने के अहसास
से वाकिफ हूँ 
पर जमानै मैं और भी हैं 
जालिम, जेल और जेलर
कर्म और कर्तब्य की वेड़ियां
जो छीजतीं है
तुम्हारे वहाँ होने के अहसास को 
गुलाब की पँखुड़़ियों पर पड़ती
हथौड़े की चोट की तरह

K_vikramSingh
19-8-2017 Bhind

Posted at fB

हायकू १

उनींदी आँखे
स्वप्न भरी तरी
साहिल कहाँ----

    K_vikramsingh
22-8-2017 Kyari pura 
      Bhind (mP) 
Also posted on FB 

शनिवार, 19 अगस्त 2017

घोंघा वसंत

मैने कुछ नहीं लिखा जी 
लेकिन तुम , 
तुम तो आशु कवि हो 
यकीनन 
और में 
पेड़ की शाख पर वैठा हुआ
कालिदास का  
पूर्वार्ध .....
अपनी ही शाख को काटता हुआ 
घोंघा वसंत 
मैं ................!

Vikram singh bhadoriya
19-8-2017

सोमवार, 14 अगस्त 2017

बात कुछ वनी भी थी

बात कुछ बनी भी थी 
कि हाय तुम छिटक गयीं 
ओस की बूंद सी 
दूब पर परी खिलीं 
रश्मियाँ रवीश की
इंद्र धनुष सी बनी
तनी तनी सुहासिनी
स्मृतियों के छोर सी।

बरस के बादल चुके 
झुके झुके उदास से
पर न तुम तब रुकीं
मृग मरीचिका वनीं
रेत पर गई छली 
हाय अतृप्त प्यास सी
      K_vikramsingh
     13-08-2017
B-1176 आनन्द नगर , सागर ताल मार्ग 
ग्वालियर म.प्र भारत 
    gwalior चित्रांकन गूगल से साभार 


सोमवार, 31 जुलाई 2017

हुँह नींद में तो बस ऐसे ही लिखा जाता है

हुँह नींद में तो बस ऐसे ही लिखा जाता है 
यथार्थ के कंकड़ से भी कहीं पानी बिखर जाता है?
यथार्थ के कंकड़ से उठती है हिलोर
ठहरी हुई स्मृतियों की झील के स्तब्ध पानी में
और तुम्हारा वह 
चन्द्र किरणों के बीच
झिलमिलाता हुआ बिंम्ब
न जाने कितनी किरणों से
बिखेर देता है तुम्हारी यादों को
हज़ारों हजार चाँद के टुकड़ों में 
छिटक कर, तब
मन के आँगन में 
बिछी हुई चाँदनी सी
मुस्कुराने लगती हो तुम ।।
      K_vikramsingh
           विक्रम ३.०६ पूर्वाह्न

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

गुरिन्दर दी सिपियाँ अहसास दीं

    
      

      डाॅ गुरिन्दर गिल "गौरी " जब भी कुछ लिखतीं हैं वह मुझे समालोचना के लिये ज़रूर भेजती है । पर यह मेरा दुर्भाग्य ही था कि उसकी "नग़मा -ए-ज़िंदगी "     के वाद प्रकाशित काव्य संग्रहों का मैं प्रमाद वश आलोचनात्मक अध्ययन करने से महरूम रहा हूँ । इसके लिये मुझे गुरिंन्दर की नाराज़गी भी झेलनी पड़ी व उलाहना भी सुनना पंड़ा ।इस नाराज़गी के बावजूद भी ,अभी कुछ दिन पहले उसने अपने नये प्रकाशनाधीन काव्य संग्रह "सीपियाँ एहसास की " की सभी कवितायें ई मेल से भेजीं हैं और साथ में धमकी भी दी है कि अगर इस वार मैंने उन्हें पढ़ कर अपनी अभिव्यक्ति टीप नहीं भेजी तो वह ज़िंदगी भर मुझसे बात नहीं करेगी ।
        मेरी प्यारी यह नकचढ़ी बहन गुरिंन्दर जब भी लिखने वैठती है तो वह हड़बड़ी में अक्सर यह भी भूल जाती है कि, कौन साथ चला कौन पीछे छूट गया । किसको धौल पड़ी और किसको टँगड़ी मारी ,उसके "शब्दों के सफर " में सारे के सारे विचार ,एहसास ,छंन्द और लय सब कुछ गड्डमगड्ड  व चकरघिन्नी होते नज़र आते है । लिखते वक़्त उसे बस एक ही फ़िक्र रहती है कि कहीं कोई एहसास कोई  "राज ए दिल " कोई भी भावावेश कागद पर उकेरे जाने से बच न पाये । 
     यूँ तो सीपियाँ चुनने व सहेजने का शौक़ उसे बचपन से ही रहा है । जब वो माँ के साथ अमृतसर में हरमन्दिर साहब में मत्था टेकने जाती थी तब वहाँ के अमृत सरोवर में डुबकी लगा कर छोटी -छोटी सीपियाँ ढूँढ कर निकाल लाती,खेल खेल में ही उन सीपियों में मानवीय अहसास की कल्पनाओं के मोती सजाती , उन्हें  सवाँरती ,जब शादी के बाद वह मलय एशिया पहुँची तो वहाँ भी उसने लातार दातू की "भाषा" के समन्दर की मनचली लहरों द्वारा समय के साहिल पर छितरा दी गईं मानवीय संवेदनाओं की सीपियों को चुनना व सहेज कर रखना अपना शग़ल बना लिया ,और आज उसकी चुन चुन कर सहेजी गईं ये सीपियाँ मानवीय अहसासों  के साहित्यिक मोतियों से लवरेज हैं । 
      अमृत सरोवर से ली गई   "पंजाबी " की मिठास ,लखनऊ की "उर्दू " की नफ़ासत के साथ लातार दातू की  "भाषा"  के समन्दर के ख़ारेपन का अहसास लिये ,डाॅ.गुरिंन्दर गिल "गौरी" की यह काव्य रचनाओं के मोतियों से भरी सीपियाँ उसकी क़लम के आवे- जमजम  के काव्य  निर्झर से  नि:सृत कल कल निनाद करती  सरिता में , व-रास्ते  "राज-ए-दिल"  प्रवाहित होतीं  व " नग़मा-ए-ज़िंदगी "(२०१४) "इस मुक़ाम पर "(२०१५) "करम फरमाई "(२०१६) के  "शब्दों के सफर" (२०१७)में प्रवाहमान गुरिन्दर की सद्य:प्रकाशित यह   "सीपियाँ एहसास कीं " सचमुच अपने आप में सागर को समाहित किये हुये हैं । सास्नेह । 
         इस काव्य संग्रह में उसकी कविताओं में "वक़्त को मुट्ठी में बंद कर लेने की ख़्वाहिश " "दीन ओ ईमान  की वातों "में क़त्लेआम आम मचाने का दर्द ,अपनी मात्ृ भूमि पर नेताओं के हुड़दंग पर आक्रोश " जब भी देखूँ मैं अपने हिंन्दुस्तान को " में ध्वनित हुआ है तो " पत्थर के घरों में रहते पत्थर " मैंने देखा है सड़क पर चीथड़ों में लिपटी लाश " , में जहाँ सारे जहाँ का दर्द का एहसास कवियत्री की क़लम को दर्द लिखने को वेताव वेगास किये दिखता है , वहीं " कहाँ से आरहा है इंसान " कविता में वह वेद व उपनिषदों के सृष्टि व समष्टि के उद्भव  के विषय पर भी गंम्मीर से अपने विचार रखती है । लेकिन इस सब के बावजूद वह अपनी क़लम की असमर्थता से वेगार लिखती है कि  " मेरे लफ़्ज कहते हैं चीख़ चीखँ कर ,कि मैं लिखूँ मगर मुझे लफ्जों से नहर सजाना नहीं आता "  यह मानवीय संवेदनाओं को जस का तस कागद पर उकेरने की उसकी तड़प ही है जो गुरिंन्दर की क़लम की धार को कभी कुंन्द नहीं पड़ने देती । साधुवाद । सास्नेह  । 
  
                       विक्रम सिंह भदौरिया
                   B-1176 आनन्द नगर,वहोड़ापुर 
                    सागर ताल मार्ग , ग्वालियर ,         
                      ( मध्य प्रदेश ) भारत 

मंगलवार ,१३ जून २०१७ ग्वालियर

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मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

हिंदी भाषा का नया पिंगल शास्त्र

आदरणीय Mahesh Katare Sugammahesh जी छन्द पढ़ कर विना समझे भी वाह वाह करना जितना सरल है छन्द रचना करना उतना ही कठिन है फिर छन्द रचना के साथ भाव प्रवाह भी वनाये रख पाना तो सिर्फ उन्हीं कवियों के लिये संभव है जिन पर कृपा राम की होही !  
  पर मेरे जैसे मूसर चंद अकवि के लिये तो यह वहुत दूर की कौड़ी है , नाच न आवे आँगन टेढ़ा वाले भाव के अनुसार छन्द को दोष देकर वैठ जाने के वजाय टेढ़े आगन मैं ही बंदर कूदनी नाच नाचने में मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती ा 
 विना छन्द के भी कविता की जा सकती है यह महाकवि निराला पहले ही सिद्ध कर चुके है ।पर विना भाव प्रवाह के कविता जो कि आज के  तथा कथित कवि व चुटकले वाज लिखते है उसे कविता की श्रेणी में तो क्या गद्य की श्रेणी में भी नहीं रखा जा सकता । इसलिये आज जरूरत इस बात की है कि जो भी मूर्धन्य अत्प सख्यक कवि साहित्य जगत में शैष है उनकी एक उच्च स्तरीय कमेटी गठित की जाय व पिंगल शास्त्र में शास्त्रीय छंन्द विधा के नये उप विभाग वना कर उसमें १,बंदर कूदनी छंन्द ,२,कचर कचरा छंन्द ,३पद दलित विगलित छंन्द ४,झकझकिया छंन्द और मूसर चन्दा छंन्द विधा को भी नव हिन्दी पिंगल शास्त्र में प्रतिष्ठित किया जाने की  कृपा की जाय । निवेदक 
Vikram singh bhadoriya 
11-4-2017 Bhind 

रविवार, 12 मार्च 2017

होली २०१७मार्च१२

सुरमई नयनों की कोर से 
रतनारे रुखसारों की लाली
लेकर यह मधुमय वसंत ,
चढ़ आया है देखो पंचसर ,
 ले पुष्पराग यह धनुष तान,
घायल कर डाले सब ह्रदय त्राण
फिर भी है उन्मत्त ,यह प्राण प्राण 
उड़ते फिरते हैं ले रंग संग 
गालों पर मलते गुलाल ....
स्वागत प्रिय सुखकर वसंत ....!
--Vikram singh bhadoriya 
    Holi 12 march 2017 
Photo courtesy Dr Neetu Sikarwar