हुँह नींद में तो बस ऐसे ही लिखा जाता है
यथार्थ के कंकड़ से भी कहीं पानी बिखर जाता है?
यथार्थ के कंकड़ से उठती है हिलोर
ठहरी हुई स्मृतियों की झील के स्तब्ध पानी में
और तुम्हारा वह
चन्द्र किरणों के बीच
झिलमिलाता हुआ बिंम्ब
न जाने कितनी किरणों से
बिखेर देता है तुम्हारी यादों को
हज़ारों हजार चाँद के टुकड़ों में
छिटक कर, तब
मन के आँगन में
बिछी हुई चाँदनी सी
मुस्कुराने लगती हो तुम ।।
K_vikramsingh
विक्रम ३.०६ पूर्वाह्न

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