सोमवार, 14 अगस्त 2017

बात कुछ वनी भी थी

बात कुछ बनी भी थी 
कि हाय तुम छिटक गयीं 
ओस की बूंद सी 
दूब पर परी खिलीं 
रश्मियाँ रवीश की
इंद्र धनुष सी बनी
तनी तनी सुहासिनी
स्मृतियों के छोर सी।

बरस के बादल चुके 
झुके झुके उदास से
पर न तुम तब रुकीं
मृग मरीचिका वनीं
रेत पर गई छली 
हाय अतृप्त प्यास सी
      K_vikramsingh
     13-08-2017
B-1176 आनन्द नगर , सागर ताल मार्ग 
ग्वालियर म.प्र भारत 
    gwalior चित्रांकन गूगल से साभार 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें