बात कुछ बनी भी थी
कि हाय तुम छिटक गयीं
ओस की बूंद सी
दूब पर परी खिलीं
रश्मियाँ रवीश की
इंद्र धनुष सी बनी
तनी तनी सुहासिनी
स्मृतियों के छोर सी।
बरस के बादल चुके
झुके झुके उदास से
पर न तुम तब रुकीं
मृग मरीचिका वनीं
रेत पर गई छली
हाय अतृप्त प्यास सी
K_vikramsingh
B-1176 आनन्द नगर , सागर ताल मार्ग
ग्वालियर म.प्र भारत
gwalior चित्रांकन गूगल से साभार

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