मंगलवार, 4 अगस्त 2015

विचारों के उत्तुंग शिखर पर

DIL NE KABHI SOCHA THA,

Man vicharon ke utung shikhar par ek

Akela virchh hota 

Sirsti ke suprabhat ki 

Usha ki pahali kiran 

Mere nav viksit taru pallawon se ath kheliyan karti ,

Par tabhi tuti tandraa 

Uttar main MAYA ka kroor attahaas se

KENDR main Bhristachaari NANGON ke naach se 

Purav main MAMATA KE niraday cheetkar se

Nyay ke liye hahakar karate ,

Hajaron ANNA HAZAARF

Sach bole kar LANGOTI bacha kar bhagate baba  Ram Dev. 


दिल ने कभी सोचा था .. 

मैं विचारों के उत्तुंग शिखर पर ,

एक अकेला वृक्ष होता । 

सृष्टि के सुप्रभात की  ,उषा की पहली किरन...

मेरे नव विकसित तरु पल्लवों से अठखेलियाँ करती 

पर तभी , टूटी तंन्द्रा 

उत्तर में माया के क्रूर अट्टहास से 

केन्द्र में भ्रष्टाचारी नंगों  के नाच से 

पूर्व में ममता के निर्दय चीत्कार से 

न्याय के लिये हाहाकार करते... 

हज़ारों अन्ना हज़ारे  और ,

सच वोल कर लँगोटी वचाने की जुगत में 

मैदान छोड़कर भागते बाबा रामदेव । 


विक्रम सिंह भदौरिया 

५अगस्त २०१५