DIL NE KABHI SOCHA THA,
Man vicharon ke utung shikhar par ek
Akela virchh hota
Sirsti ke suprabhat ki
Usha ki pahali kiran
Mere nav viksit taru pallawon se ath kheliyan karti ,
Par tabhi tuti tandraa
Uttar main MAYA ka kroor attahaas se
KENDR main Bhristachaari NANGON ke naach se
Purav main MAMATA KE niraday cheetkar se
Nyay ke liye hahakar karate ,
Hajaron ANNA HAZAARF
Sach bole kar LANGOTI bacha kar bhagate baba Ram Dev.
दिल ने कभी सोचा था ..
मैं विचारों के उत्तुंग शिखर पर ,
एक अकेला वृक्ष होता ।
सृष्टि के सुप्रभात की ,उषा की पहली किरन...
मेरे नव विकसित तरु पल्लवों से अठखेलियाँ करती
पर तभी , टूटी तंन्द्रा
उत्तर में माया के क्रूर अट्टहास से
केन्द्र में भ्रष्टाचारी नंगों के नाच से
पूर्व में ममता के निर्दय चीत्कार से
न्याय के लिये हाहाकार करते...
हज़ारों अन्ना हज़ारे और ,
सच वोल कर लँगोटी वचाने की जुगत में
मैदान छोड़कर भागते बाबा रामदेव ।
विक्रम सिंह भदौरिया
५अगस्त २०१५
