मुझे अपने मन की बात इस नमो एप पर शेयर करने के अवसर के लिये आप का आभारी हूँ । निवेदन है कि आज़ाद भारत में आज भी सारे कानून वही लागू है जो अँग्रेजों के द्वारा राज्य व दवंग व अमीर व अपराधियों के संरक्षण के लिये और इनके द्वारा ग़रीब आदमी के शोषण व उस पर अत्याचार करने के उद्देश्य से वनाये गये थे । इन क़ानूनों में विशेष कर सिविल व न्यायिक दण्ड प्रक्रिया संहिता में इस वात का विशेष प्रावधान किया गया है कि भारत की ग़ुलाम जनता के पीड़ित सदस्य को जीवन भर पुलिस व कचहरी के चक्कर काटने के बाद भी न तो न्याय मिल सके और न हीं मरते दम तक न्याय मिलने की उसकी उम्मीद ही ख़त्म हो ।
पर देश आज़ाद होने के 70 वर्ष वाद भी वही कानून लागू है । कानून का पालन करने वाला कमज़ोर व ग़रीब आदमी इस कानून की सहायता से राज्य व दवंग व अपराधियों द्वारा सताया जा रहा हैइससे वड़ा धोखा प्रजा तन्त्र में और क्या हो सकता है । हमारे देश में आम जनता के साथ होने वाले हर अत्याचार अनाचार दुराचार इन्हीं कानून के तहत नियम व क़ायदे वना कर किये जाते हैं । । जिनमें से वहुत से क़ानूनों को आप मिटा चुके है पर मुख्य वड़े़ कानून IPC , CrPC CPC व भारतीय साक्ष्य विधान के तहत चालाकी के साथ प्रविष्ठ किये गये अन्याय मूलक प्रावधान ही सबसे वड़े अन्याय की जड़ है । जिनमें वहुत मामूली से फेरवदल व संशोधन करके इन्हें जन विरोधी से जन हितैषी क़ानूनों में तब्दील किया जा सकता है ।
उदाहरण के लिये .... IPC मैं
FIR लिखने व कार्यवाही करने का अधिकार नहीं होता ।
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उदाहरण के लिये धारा 323, IPC के तहत
यदि कोई अपराधी किसी के साथ भौथरे हथियार लाठी या लोहे की कांड से या लात घूँसों व डंडे से मारपीट कर लहूलुहान कर देता है तो तो यह अपराध धारा 323 IPC के तहत असंज्ञेय वनाया गया होने से पुलिस अपराधी के खिलाफ न तो थाने पर उस पीड़ित की रिपोर्ट पर FIR लिखेगी और न गुँडे के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही ही कर सकती है ।
ऐसी स्थित वह CrPC धारा 155 के तहत एक असंज्ञेय या अदम चैक रजिस्टर में उसकी रिपोर्ट का संक्षेप लिख कर उसका मेडिकल करवा कर तथा न्यायालय में चाराजोई ( प्राइवेट शिकायत करने ) करने की हिदायत देकर थाने से चलता कर देती है ।
लेकिन पीड़ित यदि मार खाते बक्त उस दवंग या रसूख़ वाले व्यक्ति को गंदी गाली देता है या फिर जान से मारने की धमकी देता है तो उसी पुलिस थाने में दवंग की रिपोर्ट पर यह पुलिस गरीब व पिटने वाले के खिलाफँ धारा 294 506 IPC के तहत मुक़दमा क़ायम कर उल्टे पीड़ित को ही ग़ैर ज़मानती अपराध में गिर्फतार करके जेल भेज देती है ।
परिणामत: वह पीड़ित व्यक्ति मन ही मन पुलिस को गालियाँ देता अपने घर जाकर बैठ जायेगा या फिर ज़्यादा स्वाभिमानी हुआ तो कानून हाथ में लेकर बदला लेने की सोचेगा । या जैसा कि CJI ने कहा था कि तब वह माफिया के पास पहुँच जायेगा ।
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थाने पर F I R लिखाने के लिये फ़रियादी यदि असर रसूख़ वाला है या उसकी सिफ़ारिश या फ़ोन करवा कर जाता है या फिर पैसा देता है तो वही पुलिस उसी असंज्ञ्ेय अपराध को उसकी भाषा वदल कर उसे संज्ञेय बना कर तत्काल रिपोर्ट लिख लेंगी और कार्यवाही भी करेगी । यह व्यवस्था भी हमारे कानून में ही मौजूद है । और अगर पुलिस नहीं चाहे तो हमारे देश काप्रधान मनं्त्री ख़ुद भी पहचान छुपा कर जाय तो उसे भी अपनी F I R लिखाने में पसीने आ जायेंगे ।।
मारपीट पर हाथ पैर टूट जाने फ़्रैक्चर होजाना धारा 325 IPC के तहत
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संज्ञेय अपराध है पर तब भी पुलिस F I R नहीं लिखेगी ....
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यदि ऐसी मारपीट में पीटने वाले के हाथ पैर टूट जाते हैं तब पुलिस रिपोर्ट/F I R लिखने के पहले मेडिकल रिपोर्ट का इतंजार करती है जो अक्सर 15 दिन से लेकर कई महीनों इंतज़ार करने बाद आती है । तब धारा 325 के तहत पुलिस F I R तो लिखती है लेकिन यह अपराध पुलिस संज्ञेय होने के साथ ही अपराधी की सहायता के उद्देश्य से जमानतीय वनाया गया है जिससे पुलिस अपराधी को थाने पर ही , पिटने वाले के सामने ही उसे ज़मानत पर रिहा करने को वाध्य होती है ।
पर पीड़ित व्यक्ति के साथ कानून का उपहास व उत्पीड़न यहीं नहीं रुकता ...जारी रहता है ..... ...
इसी कानून के प्रावधानों केतहत
यदि अपराध संज्ञेय है तब भी पीड़ित की रिपोर्ट नहीं लिखी जायेगी
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यदि दवंग आरोपी या राज्य सरकार चाहती है कि फरियादी की संज्ञेय रिपोर्ट पर भी F I R नहीं लिखी जाय तब वह फ़रियादी से आवेदन लिखवा कर लेने व जाँच करने के वहाने रिपोर्ट को गदरबूद कर दिया जाता है , जबकि CrPC में शिकायत जाँच करने का अधिकार सिर्फ मजिस्ट्रेट को होता है । पुलिस को नहीं । पर राज्य सरकारें लाखों की संख्या में FIR सिपाही से लेकर dGP तक जाँच करवा कर जुर्म को छुपाने व अपराधियों को बचाने में मशगूल है ।
असमज्ञेय मामले में न्यायालय में चारा जोई
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न्यायालय किसी संज्ञेय या असंज्ञेय अपराध में या आवेदन लेकर संज्ञान ले सकता है लेकिन क़ानूनी प्रक्रिया यहाँ भी आरोपी की सहायता करने की मंशा से बनाई गई है ।
न्यायालय में शिकायत कर्ता को पहले तो यह सिद्ध करना होता है कि शिकायत के समर्थन में पर्याप्त सबूत उसके पास हैं , फिर न्यायालय कुछ दिन महीने या कई साल सिर्फ जाँचने के वहाने न्यीलय के चक्कर कटवायेगी और फ़रियादी यदि एक भी तारीख़ पर हाज़िर होने से चूक गया तो न्यायालय उसका आवेदन ख़ारिज कर देगी । यह प्रावधान CrPC के तहत है ।
पुलिस द्वारा विवेचना
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के दौरान जो भी साक्ष्य एकत्र की जाती तथ जिन गवाहों के कथन लिखें जाते है या कोई वस्तु ज़ब्त की जाती हगिर्फ्तार अपराधी द्वारा जो स्वीकारोक्ति की जाती है । या पुलिस द्वारा किसी अन्य सक्षम न्यायालय में किसी गवाह या मुलज़िम के धारा 264 CrPC के तहत कथन करवाये जाते है वह सभी पर साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों की बजह से न्यायालय उस पर विश्वास नहीं करती ।
परिणाम स्वरूप पुलिस द्वारा विवेचना में जाया किया गये समय का कोई उपयोग नहीँ होता और चार्ज सीट दाख़िल किये जाने के बाद न्यायालय पुन: उसी केस की आरम्भ से सुनवाईँ करती है । जिससे फ़रियादी व गवाह रोज़ रोज़ न्याय के चक्कर काटते हुये परेशान होकर या तो चुप होकर घर वैठ जाते है । या राजीनामा कर लेते है अथवा हताश होकर मुकर जाते हैं । या ज़िन्दगी मेंदुवारा पुलिस में रिपोर्ट न करने की व गवाही न देने की क़सम खा लेते है । इस प्रकार आरोपी के हित में सारी कार्यवाही हमारे कानून के तहत ही की जाती है । और आरोपी न्यायालय से वरी हो जाता है ।
सिविल कानून की माया तो और भी विचित्र है । यहाँ अगर कोई लठैतो या पैसे वाला व्यक्ति सुखाधिकार के कानून के तहत किसी की पत्नी या सम्पति पर बल पूर्वक या किरायेगार आदि बन कर क़ब्ज़ा करके कई शताब्दी तक उसका उपभोग करते हुये फ़रियादी तथा उसकी कई पीढ़ियों को न्यायालय में पैसा ख़र्च करते रहने व चक्कर काटने को मजबूर कर सकता है ।
उदाहरण १. बाबरी मस्जिद राम मंदिर केस आपके सामने ही है
उदाहरण -२. मेरी स्वयं का ज़मीन विवाद का केस जो मेरे पर पितामह द्वारा सन् 1942 में ख़रीदी गई ज़मीन पर आरोपी पक्ष के अवैध क़ब्ज़ा कर लेने के विरुद्ध दायर किया गया था । जिसमें विगत 77 वर्षों में प्रत्येक न्यायालय का फ़ैसला हमारे हक़ में होने के बावजूद आरोपी पक्ष अब भी तीन पीढ़ियों से ज़मीन पर क़ाबिज़ होकर खेती कर रहा है और उसी से केस लड़ रहा है । और फ़रियादी पक्ष की तीसरी पीढ़ी ज़मीन पर क़ब्ज़े की आश लिये संसार से विदा बोने की तैयारी में है ।
ऊपर दिये गये उदाहरणों से मिलते जुलते अन्याय का पक्ष लेने वाले प्रावधान हर पुराने व नये भारतीय कानून का अंग वन चुके है जो सिर्फ अन्याय का पक्ष लेने के लिये वनाये गये है जिनका उपयोग कानून का पालन करने वाली शाँतिप्रिय जनता के खिलाफ अत्याचार अनाचार व भ्रष्टाचार करने के लिये खुले आम किया जाता है ।
कानून में रखे गये इन अन्याय परक क़ानूनों व न्याय में होने वाली देरी को को बहुत छोटे व व्यवहारिक उपायों से दूर किया जा सकता है । मसलन ।
१. Law of accountability वना कर राष्ट्रपति से लेकर आम आदमी तक को उनके द्वारा किये गये प्रत्येक कार्य के लिये पूर्णत: ज़िम्मेदार वनाया जाय तथा ग़लती करने पर या ग़लत सूचना देने पर दोगुनी सज़ा के लिये विना ट्रायल तैयार रहने का क्शपथ पत्र लिया जाय । फ़रियादी व गवाहान से उनके कथनों पर हस्ताक्षर न करवाने का धारा 161 CrPC का प्रावधान ख़त्म किया जाय , जिससे जाँद एजेंसी द्वारा लिये कथन व एकत्र साक्ष्य पर ही न्यायालय अपना फ़ैसला सुना सके । तो उसे दुवारा विवेचना व कथन लेने की आवश्यकता नहीं रहेगी । गवाह को बार बार न्यायालय के चक्कर नहीं लगाना होगा जिससे उसके होस्टाइल होने की संम्भावना समाप्त हो सकेगी
कानून की समस्त धाराओं को पुलिस हस्तक्षेप योग्य घोषित किया जाय । तथा रिपोर्ट के सच झूँठ का निराकरण F I R लिखने के बाद ही क्या जाकर यथा स्थितिchalan , FR तथा ER रिपोर्ट भेज कर निराकृत किया जाय ।
पुलिस आवेदन जाँच करने को कठोरता से प्रतिबंध लगा कर दण्डनीय अपराध घोषित किया जाय ।
एसे ही कुछँ वहुत ही सरल व व्यवहारिक उपाय है जो कानून में वहुत छोटे संशोधन करके वर्तमान कानून को संविधान की आत्मा के अनुरूप न्याय परक वनाया जा सकता है । साथ ही आपसे प्रार्थना है कि यह कार्य अत :कानून विदों तथा कानून पीड़ित व्यक्तियों तथा रिटायर थाना प्रभारियों की एक कमेटी बना कर ऐसे समस्त प्रावधानो को हटाकर सच्चे व संविधान की मंशा के अनुरूप कानून में सुधार किया जा सकता है
जिन्हें यदि आप उचित समझें तो मैं स्वयं वह सारे सुझाव लिख कर भेजने या समक्ष में निवेदन करने के लिये भी सदैव तत्पर हूँ । सादर ।
Vikram singh bhadoriya (rtd) police inspector m. P. Police Gwalior 1-8--2016 gwalior