मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

हिंदी भाषा का नया पिंगल शास्त्र

आदरणीय Mahesh Katare Sugammahesh जी छन्द पढ़ कर विना समझे भी वाह वाह करना जितना सरल है छन्द रचना करना उतना ही कठिन है फिर छन्द रचना के साथ भाव प्रवाह भी वनाये रख पाना तो सिर्फ उन्हीं कवियों के लिये संभव है जिन पर कृपा राम की होही !  
  पर मेरे जैसे मूसर चंद अकवि के लिये तो यह वहुत दूर की कौड़ी है , नाच न आवे आँगन टेढ़ा वाले भाव के अनुसार छन्द को दोष देकर वैठ जाने के वजाय टेढ़े आगन मैं ही बंदर कूदनी नाच नाचने में मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती ा 
 विना छन्द के भी कविता की जा सकती है यह महाकवि निराला पहले ही सिद्ध कर चुके है ।पर विना भाव प्रवाह के कविता जो कि आज के  तथा कथित कवि व चुटकले वाज लिखते है उसे कविता की श्रेणी में तो क्या गद्य की श्रेणी में भी नहीं रखा जा सकता । इसलिये आज जरूरत इस बात की है कि जो भी मूर्धन्य अत्प सख्यक कवि साहित्य जगत में शैष है उनकी एक उच्च स्तरीय कमेटी गठित की जाय व पिंगल शास्त्र में शास्त्रीय छंन्द विधा के नये उप विभाग वना कर उसमें १,बंदर कूदनी छंन्द ,२,कचर कचरा छंन्द ,३पद दलित विगलित छंन्द ४,झकझकिया छंन्द और मूसर चन्दा छंन्द विधा को भी नव हिन्दी पिंगल शास्त्र में प्रतिष्ठित किया जाने की  कृपा की जाय । निवेदक 
Vikram singh bhadoriya 
11-4-2017 Bhind