बीज वनने की चाह में ,
अहर्निश
ज़मीन वन कर
यह
अविचल ...
प्रस्तर ,
यह ज़मीर तुम्हारा
आख़िर
फूट पड़ता है
....
सरस , सतत,सलिल प्रेम निर्झर
.बन ..!
बह निकलते हो तुम
सदा
"अनमोल "अकूत अथाह
जलराशि उदधि तुम .... !!!
Vikram singh bhadoriya
Bhind 2-9-2015 wed . 4.10am
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