प्रिय हितेश शर्मा जी आपकी चिंता बाजिब है लेकिन तमिलनाडु में हिन्दू संस्कृति आज भी जीवित है और वह हम उत्तर भारतियों की तुलना में कहीं श्रेष्ठ हिन्दू है । जहाँ हम माथे पर तिलक लगाने व धोती पहनने में संकोच करते है , वहीं तमिलनाडु में सूट बूट पहनने बाले ब्यक्ति भी माथे पर रोली चन्दन का विन्दी तिलक या त्रिपुंड और गले में तुलसी की माला ज़रूर पहनते हैं और ऐसा करने में गर्व का अनुभव करते है ।
दक्षिण के मूर्ख नेताओं ने नहीं दुष्ट नेताओं ने हिन्दू विरोध व ब्राह्मण विरोध को अपना हथियार अपनी घृणित व विघटन कारी राजनीति चमकाने के लिये बनाया , साथ ही हिन्दू धर्म व संस्कृति के विरोध के लिये यह ज़रूरी था कि संस्कृत और हिन्दी का विरोध किया जाय । क्योंकि हिन्दी व संस्कृत पढ़ा हुआ ब्यक्ति मौक़ा मिलने पर ,हिन्दू धर्म व साहित्य पढ़ लिये जाने पर इन नेताओं की असलियत जान लेने का पूरा ख़तरा मौजूद था । इसलिये जानबूझ कर ब्राह्मण , संस्कृत व हिन्दी बोलने वाले हर हिन्दू को अपमानित किया गया ।
हमारे केन्द्र के आज़ादी बाद के नेता भी ईमानदार नहीं थे । इन्होंने प्रांतों का बँटवारा भी फूट डालो राज करो की नीति पर ही भाषा के आधार पर प्रांतों का सीमांकन किया था । ताकि भारत गण राज्य में कभी भी एक संम्पर्क भाषा के तैर पर हिन्दी को प्रतिष्ठापित न किया जा सके । इसके साथ ही हिन्दी दिवस व विश्व हिन्दी दिवस जैसे आयोजन करके ग़ैर हिन्दी भाषी जनता के मन में उनकी अपनी मातृभाषा के विलुप्त हो जाने का डर एक सोची समझी नीति व राष्ट्र विरोधी षणयंन्त्र के तहत विठाल दिया गया था । जिसमें हिन्दी व ग़ैर हिन्दी भाषी दोनों प्रकार के नेता शामिल थे ।
हिन्दी का विकास अँग्रेजी केविकास की राह पकड़ कर व अँग्रेजी के विनाश के साथ ही सम्भव है । यह कार्य Narendra Modi और स्मृति ईरानी चाहें तो मात्र चार साल वचे हैं उनके पास , उनके कार्यकाल में कर सकते है और वो भी विना कोई हिन्दी सम्मेलन का प्रेपेगंडा किये बग़ैर । इसके लिये मेरे निम्न सुझाव हैं ।
१. हिन्दी भाषा का नाम लिये बग़ैर सारे भारत में आयोजित होने वाली प्रांन्तीय व केन्द्रीय नौकरी के लिये प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्तर लिखने का माध्यम सिर्फ संविधान की आठवीं अनुसूची मैं दर्ज १५भाषाओं में से किसी एक भाषा ही लिखा जाना अनिवार्य कर दिया जाये ।
२.किसी भी प्रादेशिक नौकरी की परीक्षा में अँग्रेजी का पेपर नहीं रखा जाय वल्कि उसकी जगह पर उस प्रदेश की मातृभाषां का सामन्य व सरल ज्ञान का पेपर के साथ अँग्रेजी के स्थान पर प्रादेशिक मात्र भाषा से इतर संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज भाषाओं में से एक भाषा का सरल पेपर । का अनिवार्य कर दिया जाय ।
३. सभी upsc व केन्द्र शासित प्रदेशों की नौकरी के लिये आठवीं अनुसूची की १५ भाषाओं में से एक भाषा का एक अनिवार्य पेपर तथा दूसरी भाषा के वतौर एक पेपर सरल हिन्दी भाषा का अनिवार्यत: रखा जाय ।
स्कूलों व कालेज में उनकी मान्यता वनाये रखने के लिये हर संस्था में सभी संविधान सम्मत भारतीय भाषाओं के टीचर रखा जाना अनिवार्य किये जाने के साथ ही प्रायमरी से लेकर पोस्ट ग्रेजुएट क्लास (तक चाहे वह किसी भी विषय की क्लास हो) अपनी मातृ भाषाके साथ एक भारतीय भाषा की पढ़ाई अनिवार्य करने के साथ ही यह व्यवस्था भी की जाय कि भाषा की परीक्षा में फ़ेल होने पर श्रेणी पर कोई प्रभाव नहीं पड़े लेकिन अधिक नम्बर आने पर परीक्षा परिणाम में श्रेणी सुधार के लिये भाषा के अतिरिक्त मार्क्स जोड़े जा सकें ।
संविधान व क़ानूनों की किताबों में किसी अर्थ मैं विवाद की स्थिति में वर्तमान में जो अभी अँग्रेजी वर्जन को शुद्ध व अंतिम सत्य माना जाता है । यह परिपाटी ख़त्म करके इसके बजाय हिन्दी वर्जन को ही प्रामाणिक माना जाय इस हेतु तथा
सभी प्रादेशिक न्यायालय व उच्च न्यायालयों की भाषा अनिवार्य रूप से उसी प्रदेश की ही भाषा हो जहाँ वह न्यायालय स्थित है, तथा सर्वोच्च न्यायालय की भाषा अनिवार्यत: हिन्दी ही हो । इस हेतु सर्वोच्च न्यायालय से चर्चा करके लोक सभा में प्रस्ताव पारित करके या न्यायालय से आदेश जारी करवा कर व्यवस्था की जाय ।
उपरोक्त तरकीब से हम सिर्फ पाँच साल मैं न सिर्फ हिन्दी का वल्कि देश की सभी संवैधानिक भाषाओं का समग्र विकास करते हुये हिन्दी को केन्द्रीय भाषा व राष्ट्रीय एकता की वाहक भाषा के रुप में स्थापित करने में सक्षम हो सकते है ।
Vikram singh bhadoriya
२८-११-२०१५
रामेश्वरम् तमिलनाडु , स्वयं की Fb post पर@हितेश शर्मा के कमेंट के उत्तर पर लिखी गई
