शुक्रवार, 6 अगस्त 2021

वक्त की टहनी पर लौट आया है वसंत ६

वख्त की सूखी हुई टहनी पर 
लौट आया है फिर से वसंत ......
तुम्हारी भेजी हुयी 
टहनी 🌿 की कलम (बूटी) 
नेह की बारिष में 
भीग कर 
अब भरा पूरा बृक्ष 
 बन चुकी है 
लहलहा उठे हैं 
उपवन में, नव किसलय किंसुक कुसुम
लौट आया है देखो! 
फिर से
वह कुसुमाकर
पुष्पायुध लिये... 

विक्रम सिंह भदैरिया 
24 - 5-—2014

शनिवार, 27 मार्च 2021

दस्तान-ए-अंजुमन (मजमुआ-ए-नज्म) व कलम् शायरा - - दुआ प्रोमिला,,, ऑकलैंड, न्यूजीलैंड

मेरे दुश्मन
सोचती हू़ँ
तेरी यादों को मैं आग लगा दूँ
इस कदर सुलगती हैं
जैसे लेबान जलता हो हर पल
क्या इनका धुआं नहीं पहुँचता तुम तक
या फिर 
तुम्हें आदत होगई है
अश्कों से आग बुझाने की,,,
आदरणीया प्रोमिला दुआ जी का यह नज्म संग्रह जब मुझे मिला मन अन्यमनस्क था, बुझा हुआ, पढ़ने लिखने से तौवा किया हुआ. पर जब यह मजमुआ - ए-नज्म पेशे नज़र हुआ तो खुद को पढ़ने से न रोक सका और पढ़कर इतना  हस्सास हो उठा कि कलम खुद व खुद इसपर त़फ़शरा लिखने वैठ गई.
,,,,,,, प्रोमिला दुआ जी की यह मजमुआ-ए-नज्म यह "दस्तान-ए-अंजुमन" की नज्में हैं या रुबाई हैं या और कुछ है, पर मेरी नज़र में तो यह,, दास्तां - ए-सुखनवर हैं, किसी तृषित दिल की दुआयें हैं, जो नस्र की गईं है किसी प्यारे से दुश्मन के नाम पर. यह सुलगती हैं दहकतीं है, इनमें आहों का धुंआ भी उठता है ़और लपटें भी,,, पर यह सब घटित होता है एक हस्सास दिल के तहखाने में, जहाँ पिघला हुआ इक लावा है जो तप्त तरल हो वह निकलता है, गर्म और खारे पानी का ़इक सोता बन कर...
"कलम भी सिसकती रही है/लफ़्जों के गले मिलकर /शायद तुम समझो /शायद न समझो,,," 
दुआ प्रोमिला जी की इस मजमुआ "दास्तान - ए-अंजुमन की हर नज्म यादों का एक पहरहन है, इक हस्सास रूह का  कलामे दुआ है, इक दालान है किसी के विछोह के मकां का जहाँ यादें वैठ कर सिसकती है,  इक दूजे के गले लग कर, वह झगड़तीं है, उस दुश्मन से, जिसके वगैर वह जिंदा नहीं रह सकतीं...
...... इस मजमुआ की हर इक नज्म इक मकां है जिसकी दीवार पर छतराये हुये हैं कांपती हुई रूह के मोहब्ब के रंग..,,,, जिसके करीब है, जलता हुआ इक माजी का आलाव है, राख में डूबी हुई चिन्गारी है, राख हो चुके लम्हे  हैं और कुछ टूटे हुये कु़छ जलते हुये सपने हैं . जहाँ वैठ कर दुआ जी की नज्में "ऊन के गोले जैसी जिंदगी को लपेटते लपेटते मन की सलाइयों पर अनगिनत ख्वाब बुनतीं" नजर आतीं हैं.
..... इस मजमुआ की हर नज्म कितने ही गम, कितनी आहें, कितने वेताब हसरतों के जनाज़े अपने कांधों पर उठाये हुये चलती है, वहजो लवरेज हैं, उन "सिसकियों की आहट से/ जो दबीं है सदियों से/ किसी के खामोश लवों पर /और वेताब हैं किसी काँधे के लिये/ जहाँ वो रख सकें /अपना सर/ और पा सकें सकून पल दो पल के लिये...." 
..... कहीं  कहीं तो अश्क-ओ- हस्सास की हमदम, यह नज्में, निराशा के गर्त में इतने गहरे तक डूब जातीं हैं कि वह  कह उठतीं है,,,, "कैद है/ रूह मेरी /जिस्म के ताबूत में /जो रूह निकले/तो तू निकले /जो तू निकले /तो रूह निकले /,,,, और जब शायरा का अशांत जेहन कुछ शांत होता है कभी, तो कह उठता है,," कुछ अनकहे शब्द /कुछ खामोशी लफ्जों
 की / न क़ातिल मेहरवां न मौत /मिट्टी मिट्टी में मिलती रही / कभी जिस्म मिट्टी  का /कभी ज़ज्वात मिट्टी के,,,,"
,,,,,, इस मजमुआ की कुछ नज्मों में  लीक से हट कर  मुस्कराहट के मौजूँ भी हैं, कुछ समाज पर, कुछ हालात पर कटाक्ष करती नज्में भी हैं,,, कुछ सूफियाना कलाम भी हैं यहाँ" वक्त की रेत पर /गिर कर सूख गईं /शबनम की बूँदों की तरह,,,,,, वो आँसू /आज तक न टपका आँख से मेरी/जिसमें मैने /जमाने भर की मुस्कराहटें छुपा रखीं थीं.,, 
,,,,और अंत में वह शायरा लिखती हैं,,, 
" मैं खुश्क रेत हूँ/ और आंधियों की ज़द में हूँ/मुझे समेट ले मेरे मालिक के कहीं विखर न जाऊँ मैं,,,
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, विक्रम सिंह भदौरिया
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, 27-March 2021
B-1176 आनन्द नगर, ग्वालियर, 474012