वख्त की सूखी हुई टहनी पर
लौट आया है फिर से वसंत ......
तुम्हारी भेजी हुयी
टहनी 🌿 की कलम (बूटी)
नेह की बारिष में
भीग कर
अब भरा पूरा बृक्ष
बन चुकी है
लहलहा उठे हैं
उपवन में, नव किसलय किंसुक कुसुम
लौट आया है देखो!
फिर से
वह कुसुमाकर
पुष्पायुध लिये...
विक्रम सिंह भदैरिया
24 - 5-—2014
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें