मेरी कविता में तुम ...
सीप में ,
समाई में ,
समाई हुई मोती सी ,
रात को चाँद ने
जब
विखेरा तुम्हें ,
क़तरा कतरा शवनम सा
चाँदनी की चादर पर ...
समेटता रहा
में ..
तुम्हें ..
जीवन भर
फिर फिर , सात जन्म तक ।
पर,
हाथ कब आती हो तुम
फिसल फिसल जाती हो तुम
हर वार इक नईँ हार
स्वीकार ...!
न तुम करती हो न मैं
....और यह जीवन
और वह मंृत्यु
चक्र है ...वस !
चलता रहता है
यूँ ही....!
विना रुके , विना थके
अहर्निश ।।
विक्रम सिंह भदौरिया
ग्वालियर २४-६-२०१५
नीलू नीलम की कविता (हाँ पढ़ी तुम्हारी कविता ) से प्रेरित

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें