गुरुवार, 25 जून 2015

मेरे जीवन में तुम ...

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मेरी कविता में तुम 

मेरी कविता में तुम ... 

सीप में ,

समाई में ,

समाई हुई मोती सी , 

रात को चाँद ने 

जब 

विखेरा तुम्हें ,

क़तरा कतरा शवनम सा 

चाँदनी की चादर पर ...

समेटता रहा 

में ..

तुम्हें ..

जीवन भर 

फिर फिर , सात जन्म तक । 

पर,

हाथ कब आती हो तुम 

फिसल फिसल जाती हो तुम 

हर वार इक नईँ हार 

स्वीकार ...!

न तुम करती हो न मैं 

....और यह जीवन 

 और वह मंृत्यु 

चक्र है ...वस !

चलता रहता है  

यूँ ही....!

विना रुके , विना थके 

अहर्निश ।। 


             विक्रम सिंह भदौरिया 

                 ग्वालियर २४-६-२०१५

नीलू नीलम की कविता (हाँ पढ़ी तुम्हारी कविता ) से प्रेरित 

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