एक और अकविता ।
औरत का बजूद ..
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औरत का बजूद ..
एक धान के पौधे सा
उसे बोया किसी ने
फिर उखाड़ कर रोपा किसी ने
सींचा किसी नाशुकरे वटाईदार ने
काटा लूना फिर कूटा
तिनका तिनका ,भूसा, दाना
अलग, अलग
किया किसी ने .....
रूँधा , रांधा ,पकाया
खाया किसी ने ...
फिर खो गया कहीं ,
उसका बजूद ....
जो था हमेशा से ही ,
नेस्तनाबूद..................!
विक्रम सिंह भदौरिया
...................30-5-2014......
Photo सौजन्य गूगल /faminismindia से साभार


