गुरुवार, 5 मई 2016

एक अकेला आदमी

 उँ  "नमो " भगवते वासुदेवा: 

एक अकेला आदमी 
चला जा रहा है 
बोझा उठाये ,अनवरत  ,अथक 
 साथ सवा अरब 
कुछ उमंग भरे युवा 
कुछ बोझिल और अपाहिज, 
कुछ सिरफिरे अहँकारी प्रेतों की 
बदबूदार लाशें,
उठाये हुये 
उसके वह दृढ़ स्कंध 
दृढ़ संकल्प लिये 
चल रहा है वो
अनवरत 
विना थके विना रुके 
पाँव दर पाँव 

कुछ देश द्रोही समाज कंटक भी हैं ,
यहाँ 
जो उग आये हैं पाँव में ,  छालों की तरह ,
पीर वन कर 
एक मूर्ख मण्डल पार्टी की वेड़ियाँ भी हैं 
साथ में 
बँधे हुये घायल पाँव लिये 
चला जा रहा है 
वो अकेला अहर्निश 

न पास कोई छाँव है 
न पास कोई ठाँव है 
न साथ  कोई साथी है 
कुछ महा मूर्खो के सिवा 

बस एक ज़िद है 
एक ज्योति  है ,जो 
अहर्रनिश ज्वाजल्यमान 

दिल में 
एक चाहत है ,एक टीस सी 
जो  उठती है 
रह रह कर 
एक हूक बन कर 


पतन के गर्त में 
डूबे हुये भारत को 
स्वाभिमान व सफलता के
 स्वर्णिम उज्जवल शिखर तक
खींच ले जाने की 
एक चाहत ,निर्विकल्प । 
    ---k_vikramsingh

Re edited on 15-5-2016 
DRPL GWL posted on 19-9-2017



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