रविवार, 14 अगस्त 2016

माँ भारती के चरणों का रक्ताभिषेक कर दे

पूर्व में उगा है आज
लाल लाल आँखों वाला सूरज 
पश्चिम के नालायक 
को देख 
उसकी आँखों में ख़ून उतर आया है 
उठो हे वीर 
वहुत हुआ शाँति पाठ 
उठा खड़ग 
हो अडिग 
युद्ध कर
रणभूमि पर
शत्रु के रक्त से 
रणचण्डी का खप्पर
लवालव भर दे 
पहन ले   आज तू
मुण्ड माल
काट काट 
नापाक भाल 
दुश्मन के लहू से
माँ भारती के चरणों
का 
रक्ताभिषेक कर दे ।

Vikram singh bhadoriya 
15 agust 2016
BHIND published on 
16 Agust 2017 
Gwalior

 

 



रविवार, 31 जुलाई 2016

भारतीय कानून आम जन की त्रासदी की मुख्य वजह

    आदरणीय प्रधान सेवक जी , 

 मुझे अपने मन की बात इस नमो एप पर शेयर करने के अवसर के लिये आप का आभारी हूँ । निवेदन है  कि आज़ाद भारत में आज भी सारे कानून वही लागू है जो अँग्रेजों के द्वारा  राज्य व दवंग व अमीर व अपराधियों के  संरक्षण  के लिये और  इनके द्वारा  ग़रीब आदमी के शोषण व उस पर अत्याचार करने के उद्देश्य से वनाये गये थे ।  इन क़ानूनों में विशेष कर  सिविल व न्यायिक दण्ड प्रक्रिया संहिता में इस वात का विशेष प्रावधान किया गया है  कि  भारत की ग़ुलाम जनता के पीड़ित सदस्य को जीवन भर पुलिस व कचहरी के चक्कर काटने के बाद भी न तो न्याय मिल सके  और न हीं मरते दम तक न्याय मिलने की उसकी उम्मीद ही ख़त्म हो । 

 पर देश आज़ाद होने के 70 वर्ष वाद भी वही कानून लागू है । कानून का पालन करने वाला कमज़ोर व ग़रीब आदमी इस कानून की सहायता से राज्य व दवंग व अपराधियों द्वारा सताया जा रहा हैइससे वड़ा धोखा प्रजा तन्त्र में और क्या हो सकता है । हमारे देश में आम  जनता के साथ होने वाले हर अत्याचार अनाचार दुराचार इन्हीं कानून के तहत  नियम व क़ायदे वना कर किये जाते हैं । । जिनमें से वहुत से क़ानूनों को आप मिटा चुके है पर मुख्य वड़े़ कानून  IPC , CrPC CPC व भारतीय साक्ष्य विधान  के तहत चालाकी के साथ प्रविष्ठ किये गये अन्याय मूलक प्रावधान ही सबसे वड़े अन्याय की जड़ है । जिनमें  वहुत मामूली से फेरवदल व    संशोधन करके इन्हें जन विरोधी से जन हितैषी क़ानूनों में तब्दील किया जा सकता है । 

उदाहरण के लिये .... IPC मैं 

१. ऐसे  सभी अपराध जो राज्य शासन व  दवंग व रसूखदार व्यक्ति व वाहुवली गुण्डे  व साम्प्रदायिक दंगे करने व करवाने वालों के द्वारा , अमूमन  कमज़ोर व शांति प्रिय नागरिकों के विरुद्धँ घटित करते रहते हैं  सभी अपराधों को , को CrPC में पुलिस हस्तक्षेप के अयोग्य यानि "असंज्ञेय " वनाया गया है तथा उनमें सज़ा का प्रावधान भी नाम मात्र को रखा गया ।  इन असंज्ञेय अपराधों में पुलिस को पीड़ित व्यक्ति की 

   FIR लिखने व कार्यवाही करने का अधिकार नहीं होता ।  

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 उदाहरण के लिये धारा 323, IPC के तहत 

             यदि कोई अपराधी किसी के साथ भौथरे हथियार लाठी या लोहे की कांड से या  लात घूँसों व डंडे से मारपीट कर लहूलुहान कर देता है तो तो यह अपराध धारा 323 IPC के तहत असंज्ञेय वनाया गया होने से पुलिस अपराधी के खिलाफ न तो  थाने पर उस पीड़ित की रिपोर्ट पर  FIR लिखेगी और न गुँडे के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही  ही कर सकती है ।  

     ऐसी स्थित वह CrPC धारा 155 के तहत एक असंज्ञेय या अदम चैक रजिस्टर में उसकी रिपोर्ट का संक्षेप लिख कर  उसका  मेडिकल करवा कर तथा न्यायालय में चाराजोई ( प्राइवेट शिकायत करने ) करने की हिदायत देकर  थाने से चलता कर देती है ।

 लेकिन पीड़ित यदि मार खाते बक्त उस दवंग या रसूख़ वाले व्यक्ति को गंदी गाली देता है या फिर जान से मारने की धमकी देता है तो उसी पुलिस थाने में दवंग  की रिपोर्ट पर यह  पुलिस गरीब व पिटने  वाले के खिलाफँ धारा 294 506 IPC  के तहत मुक़दमा क़ायम कर  उल्टे पीड़ित को ही ग़ैर ज़मानती अपराध में गिर्फतार करके जेल भेज देती है । 

  परिणामत: वह पीड़ित व्यक्ति मन ही मन पुलिस को गालियाँ देता अपने घर जाकर बैठ जायेगा या फिर ज़्यादा स्वाभिमानी हुआ तो कानून हाथ में लेकर बदला लेने की सोचेगा । या जैसा कि CJI ने कहा था कि तब वह  माफिया के पास पहुँच जायेगा । 

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  थाने पर F I R लिखाने के लिये  फ़रियादी  यदि असर रसूख़ वाला है या उसकी सिफ़ारिश या फ़ोन करवा कर जाता है या फिर पैसा देता है  तो वही पुलिस उसी असंज्ञ्ेय अपराध को उसकी भाषा वदल कर उसे  संज्ञेय बना कर तत्काल  रिपोर्ट लिख लेंगी और कार्यवाही भी करेगी । यह व्यवस्था भी हमारे कानून में ही  मौजूद है ।  और अगर पुलिस नहीं चाहे तो  हमारे देश काप्रधान मनं्त्री ख़ुद भी पहचान छुपा कर  जाय तो उसे  भी अपनी F I R लिखाने में पसीने आ जायेंगे ।। 


मारपीट पर हाथ पैर टूट जाने फ़्रैक्चर होजाना धारा 325 IPC के तहत

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संज्ञेय अपराध  है पर  तब भी पुलिस F I R नहीं लिखेगी .... 

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  यदि ऐसी मारपीट में पीटने वाले के हाथ पैर टूट जाते हैं तब  पुलिस रिपोर्ट/F I R  लिखने के पहले मेडिकल रिपोर्ट का इतंजार करती है जो अक्सर 15 दिन से लेकर कई महीनों इंतज़ार करने बाद आती है । तब धारा 325 के तहत पुलिस F I R तो लिखती है लेकिन यह  अपराध पुलिस संज्ञेय होने के साथ ही अपराधी की सहायता के उद्देश्य से जमानतीय वनाया गया है जिससे  पुलिस  अपराधी को थाने पर ही , पिटने वाले के सामने ही उसे ज़मानत पर रिहा करने को वाध्य होती है । 


  पर पीड़ित व्यक्ति के साथ कानून  का उपहास  व उत्पीड़न यहीं नहीं रुकता  ...जारी रहता है ..... ...




इसी कानून के प्रावधानों केतहत


यदि अपराध संज्ञेय है तब भी  पीड़ित की रिपोर्ट नहीं लिखी जायेगी 

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  यदि दवंग आरोपी या राज्य सरकार  चाहती है  कि फरियादी की संज्ञेय रिपोर्ट पर भी F I R नहीं लिखी जाय  तब वह  फ़रियादी से आवेदन लिखवा कर लेने व जाँच करने के वहाने  रिपोर्ट को गदरबूद  कर दिया जाता है , जबकि CrPC में  शिकायत जाँच करने का अधिकार सिर्फ मजिस्ट्रेट को होता है । पुलिस को नहीं ।  पर राज्य सरकारें लाखों की संख्या में  FIR सिपाही से लेकर dGP तक जाँच करवा कर जुर्म को छुपाने व अपराधियों को बचाने में मशगूल है । 


  असमज्ञेय मामले में  न्यायालय में चारा जोई 

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 न्यायालय  किसी संज्ञेय या असंज्ञेय अपराध में  या आवेदन लेकर संज्ञान ले सकता है लेकिन  क़ानूनी प्रक्रिया यहाँ भी आरोपी की सहायता करने की मंशा से बनाई गई है । 

   न्यायालय में शिकायत कर्ता को पहले तो यह सिद्ध करना होता है कि शिकायत के समर्थन में पर्याप्त सबूत उसके पास हैं , फिर  न्यायालय कुछ  दिन महीने या कई साल सिर्फ जाँचने के वहाने न्यीलय के चक्कर कटवायेगी  और फ़रियादी यदि एक भी तारीख़ पर हाज़िर होने से चूक गया तो न्यायालय  उसका आवेदन ख़ारिज कर देगी । यह प्रावधान CrPC के तहत है । 

   

  पुलिस द्वारा विवेचना 

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                                के दौरान जो  भी साक्ष्य एकत्र की जाती तथ जिन गवाहों के कथन लिखें जाते है या  कोई वस्तु ज़ब्त की जाती हगिर्फ्तार अपराधी द्वारा जो स्वीकारोक्ति की जाती है  । या पुलिस द्वारा किसी अन्य सक्षम न्यायालय में किसी गवाह या मुलज़िम के धारा 264 CrPC के तहत कथन करवाये जाते है   वह सभी  पर साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों की बजह से न्यायालय उस पर विश्वास नहीं करती ।

        परिणाम स्वरूप पुलिस द्वारा विवेचना में जाया किया गये समय का कोई उपयोग  नहीँ होता और चार्ज सीट दाख़िल किये जाने  के बाद न्यायालय पुन:  उसी केस की आरम्भ से सुनवाईँ करती है । जिससे फ़रियादी  व गवाह रोज़ रोज़ न्याय के चक्कर काटते  हुये परेशान होकर या तो चुप होकर घर वैठ जाते है । या राजीनामा कर लेते है अथवा हताश होकर मुकर जाते हैं । या ज़िन्दगी मेंदुवारा पुलिस में रिपोर्ट न करने की व गवाही न देने की क़सम खा लेते है । इस प्रकार आरोपी के हित में सारी कार्यवाही हमारे कानून के तहत ही की जाती  है  ।  और आरोपी न्यायालय  से वरी  हो जाता  है । 

   सिविल  कानून की माया तो और भी विचित्र है । यहाँ अगर कोई लठैतो या पैसे वाला व्यक्ति सुखाधिकार के कानून के तहत  किसी की पत्नी  या सम्पति पर बल पूर्वक या किरायेगार आदि बन कर क़ब्ज़ा करके कई शताब्दी  तक उसका उपभोग करते हुये फ़रियादी  तथा उसकी कई पीढ़ियों को न्यायालय में पैसा ख़र्च करते रहने व चक्कर काटने को मजबूर कर सकता है । 

      उदाहरण १. बाबरी मस्जिद राम मंदिर केस आपके सामने ही है 

उदाहरण -२.    मेरी स्वयं का ज़मीन विवाद का केस जो मेरे  पर पितामह द्वारा सन् 1942 में ख़रीदी गई ज़मीन पर आरोपी पक्ष के अवैध क़ब्ज़ा कर लेने के विरुद्ध दायर किया गया था ।  जिसमें विगत 77 वर्षों में प्रत्येक न्यायालय का फ़ैसला हमारे हक़ में होने के बावजूद आरोपी पक्ष अब भी तीन पीढ़ियों से ज़मीन पर क़ाबिज़ होकर खेती कर रहा है और उसी से केस लड़ रहा है ।  और फ़रियादी पक्ष की तीसरी पीढ़ी  ज़मीन पर क़ब्ज़े की आश लिये संसार से विदा बोने की तैयारी में है ।


ऊपर दिये  गये उदाहरणों से मिलते जुलते अन्याय का पक्ष लेने वाले प्रावधान हर पुराने व नये भारतीय कानून का अंग वन चुके है जो सिर्फ अन्याय का पक्ष लेने के लिये वनाये गये है जिनका उपयोग कानून का पालन करने वाली शाँतिप्रिय जनता के खिलाफ अत्याचार  अनाचार व भ्रष्टाचार करने के लिये खुले आम किया जाता है । 


 कानून में रखे गये इन अन्याय परक क़ानूनों  व न्याय में होने वाली देरी को को बहुत छोटे व व्यवहारिक उपायों से दूर किया जा सकता है । मसलन । 

१. Law of accountability वना कर राष्ट्रपति से लेकर आम आदमी तक  को उनके द्वारा किये गये प्रत्येक कार्य के लिये पूर्णत: ज़िम्मेदार वनाया जाय तथा ग़लती करने पर  या ग़लत सूचना देने पर दोगुनी सज़ा के लिये विना ट्रायल तैयार रहने का क्शपथ पत्र लिया जाय ।  फ़रियादी व गवाहान से उनके कथनों पर हस्ताक्षर न करवाने का धारा 161 CrPC का प्रावधान ख़त्म किया जाय , जिससे जाँद एजेंसी द्वारा लिये कथन  व एकत्र साक्ष्य पर ही  न्यायालय  अपना फ़ैसला सुना सके । तो उसे  दुवारा विवेचना व कथन लेने की आवश्यकता नहीं रहेगी । गवाह को बार बार न्यायालय  के चक्कर नहीं लगाना होगा जिससे उसके होस्टाइल होने की संम्भावना समाप्त हो सकेगी 

  कानून की समस्त धाराओं को पुलिस हस्तक्षेप योग्य घोषित किया जाय । तथा रिपोर्ट के सच झूँठ का निराकरण F I R लिखने  के बाद ही क्या जाकर यथा स्थितिchalan , FR तथा ER रिपोर्ट भेज कर निराकृत किया जाय ।  

पुलिस   आवेदन जाँच करने  को  कठोरता से प्रतिबंध लगा कर दण्डनीय अपराध घोषित किया जाय ।  

एसे ही कुछँ वहुत ही सरल व व्यवहारिक उपाय है जो कानून में वहुत छोटे   संशोधन करके वर्तमान कानून को संविधान की आत्मा के अनुरूप न्याय परक वनाया जा सकता है ।  साथ ही आपसे प्रार्थना है कि यह कार्य अत :कानून विदों तथा कानून पीड़ित व्यक्तियों तथा रिटायर थाना प्रभारियों की  एक कमेटी बना कर ऐसे समस्त प्रावधानो को हटाकर सच्चे व संविधान की मंशा के अनुरूप कानून में सुधार किया जा सकता है 


 जिन्हें यदि आप उचित समझें तो मैं स्वयं  वह सारे सुझाव लिख कर भेजने या समक्ष में निवेदन करने के लिये भी सदैव तत्पर हूँ । सादर । 

 Vikram singh bhadoriya  (rtd) police inspector  m. P. Police Gwalior  1-8--2016 gwalior 

 

  

    

   

मंगलवार, 31 मई 2016

औरत का बजूद

एक और अकविता । 

औरत का बजूद ..
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औरत का बजूद ..
एक धान के पौधे सा 
उसे बोया किसी ने 
फिर उखाड़ कर रोपा किसी ने 
सींचा किसी नाशुकरे वटाईदार ने 
काटा लूना फिर कूटा 
तिनका तिनका ,भूसा, दाना 
अलग,    अलग 
 किया किसी ने ..... 
रूँधा ,       रांधा   ,पकाया  
खाया     किसी ने ...
फिर खो गया कहीं ,
उसका बजूद ....
जो था हमेशा से ही ,
नेस्तनाबूद..................! 

                  विक्रम सिंह भदौरिया 
...................30-5-2014......
Photo सौजन्य गूगल /faminismindia से साभार 

सोमवार, 30 मई 2016

संविधान के घोंघा वंसत तुम

हे संविधान के घोंघा वसंत 
शत शत नमन् 
टीप कर विश्व के सारे विधान 
 मोती मांण्डूक्य पत्थर कुसुम 
आरक्षण  के नव निधान 
काले अँग्रेजों को करके निहाल 
बाँटो खाओ का नया मंन्त्र
आरक्षण के नव निधान 
तुमसे हारे गाँधी महान 
ज़िंन्ना के हे पादत्राण  तुम 
दलितायन के महायान 
       K_vikramSingh



शुक्रवार, 20 मई 2016

Corrupt mining act grave consequences

आज  भ्रष्ट भारतीय खनिज अधिनियम ,वन अधिनियम कानून तथा  हरित प्राधिकरण गठजोड़ व इनके तहत वनाये गये क़ानूनी नियम उपनियम के  कारण ईमानदारी से  खनन करने वालों तथा ईमानदारी से रोज़ी रोटी कमा कर अपना घर बनाने का सपना देखने वाले आम जन का जीना दूर कर रखा है । सरकार ने इन नियमों के तहत मकान बनाने में काम आने वाली रेत गिट्टी पत्थर जैसे मूल भूत  उत्पादों के खनन व विक्रय पर घोषित रूप से पूर्ण रूपेण रोक लगा कर सारी खदानें बंद कर रखी हैं । अत: एक नम्बर में सारी प्रक्रिया पूर्ण करके न तो ठेकेदार ईमानदारी से खदान का संचालन कर सकता है और न जनता का कोई गरीब आदमी  अपना मकान बनाने के लिये  एक बोरी रेत ख़रीद सकता है लेकिन नेता मन्त्री व अधिकारियों की मुट्ठी गरम करके तथा मीडिया का हफ़्ता चुकाने के बाद खदान मालिक अपनी वैध खदानों से अवैध खनन कर सकता है तथा आम आदमी अपने ख़ून पसीने की कमांई से मूल क़ीमत का दस गुना भुगतान करके अपना मकान बनाने को रेत गिट्टी ब्लैक मार्केट से ख़रीद सकता है । लेकिन एक नम्बर में कदापि  नहीं । 
   यह स्थिति वेहद ख़तरनाक   है क्योंकि इसमें भ्रष्टाचार करने के लिये बाक़ायदा कानून है और कानून के तहत वनाये गये भ्रष्टाचारोन्मुखी नियम हैं जिनका इस्तेमाल  कानून निर्माता व उनके नौकर  वड़ी वेशर्मी के साथ विल्कुल नंगे होकर कर रहे हैं । उत्तर प्रदेश तथा म. .प्र. के जो हालात मेरी जानकारी में हैं वह  अंततः: सरकार व आम जनता के बीच गृह युद्ध या जय प्रकाश नारायण जैसे जन आन्दोलन का कारण बन सकते  है ।  अत: प्रधान मंन्त्री जी समय रहते कुछ उपाय कर लें तो अच्छा है बरना यहाँ  सारा दोष आपके मत्थे मढ़े जाने की पूरी तैय्यारी है । 
Vikram singh bhadoriya 
Gwalior M.P. 
21-5- 16 

गुरुवार, 5 मई 2016

एक अकेला आदमी

 उँ  "नमो " भगवते वासुदेवा: 

एक अकेला आदमी 
चला जा रहा है 
बोझा उठाये ,अनवरत  ,अथक 
 साथ सवा अरब 
कुछ उमंग भरे युवा 
कुछ बोझिल और अपाहिज, 
कुछ सिरफिरे अहँकारी प्रेतों की 
बदबूदार लाशें,
उठाये हुये 
उसके वह दृढ़ स्कंध 
दृढ़ संकल्प लिये 
चल रहा है वो
अनवरत 
विना थके विना रुके 
पाँव दर पाँव 

कुछ देश द्रोही समाज कंटक भी हैं ,
यहाँ 
जो उग आये हैं पाँव में ,  छालों की तरह ,
पीर वन कर 
एक मूर्ख मण्डल पार्टी की वेड़ियाँ भी हैं 
साथ में 
बँधे हुये घायल पाँव लिये 
चला जा रहा है 
वो अकेला अहर्निश 

न पास कोई छाँव है 
न पास कोई ठाँव है 
न साथ  कोई साथी है 
कुछ महा मूर्खो के सिवा 

बस एक ज़िद है 
एक ज्योति  है ,जो 
अहर्रनिश ज्वाजल्यमान 

दिल में 
एक चाहत है ,एक टीस सी 
जो  उठती है 
रह रह कर 
एक हूक बन कर 


पतन के गर्त में 
डूबे हुये भारत को 
स्वाभिमान व सफलता के
 स्वर्णिम उज्जवल शिखर तक
खींच ले जाने की 
एक चाहत ,निर्विकल्प । 
    ---k_vikramsingh

Re edited on 15-5-2016 
DRPL GWL posted on 19-9-2017



बुधवार, 16 मार्च 2016

औरत का बजूद

एक और अकविता । 

औरत का बजूद ..
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औरत का बजूद ..
एक धान के पौधे सा 
उसे बोया किसी ने 
फिर उखाड़ कर रोपा किसी ने 
सींचा किसी नाशुकरे वटाईदार ने 
काटा लूना फिर कूटा 
तिनका तिनका ,भूसा, दाना 
अलग,    अलग 
 किया किसी ने ..... 
रूँधा ,       रांधा   ,पकाया  
खाया     किसी ने ...
फिर खो गया कहीं ,
उसका बजूद ....
जो था हमेशा से ही ,
नेस्तनाबूद..................! 

                  विक्रम सिंह भदौरिया 
...................30-5-2014......