कमलेश चौहान "गौरी " का यह उपन्यास सात जन्मों के विशाल कैनवास पर उकेरी गई एक आदर्श प्रेम गाथा है जहाँ दो प्रेमी ह्रदयों की
मानव सुलभ कोमल भावनाओं की कश्ती , बाल ,युवा व ज़रा अवस्थाओं से , जन्म- मृत्यु , देश -काल व देह की सीमाओं से वेखबर समय के उदधि में , कवियत्री व उपन्यासकारा कमलेश चौहान के भावुक गीतों की स्वर लहरियों पर थिरकती कभी , मिलन व विछोह की धूप -छाँव तले डोलती मचलती सी कभी , सात जन्मों के विस्तीर्ण रंगमंच पर मंचित एक नृत्य नाटिका सदृश्य रचना है जिसमें लेखिका मानव ह्दय के प्रेम के साथ साथ सृष्टि व समिष्ठि के , भौतिक व पराभौतिकी के , कल्पना व यथार्थ के मिलन की अद्भुत प्रस्तुति करने में पूर्णत: सफल रहीं हैं, और साथ ही वह अपने पूर्व उपन्यासों "सात समुन्द्र पार " तथा "सात फेरों से धोखा " की तरह ही इस उपन्यास में भी वह अपनी
स्त्री ह्र्दय की कुशल चित्रकार की छवि को प्रतिस्थापित करने में पूर्णत: सफल रहीं हैं ँ। मैं उनके पूर्व उपन्यासों , कविताओं तथा पटकथाओं की भाँति इस उपन्यास की भी काल जयी रचनाओं में शुमार होने की ,और सफलता की , कामना करता हूँ ।
Vikram singh bhadoriya
Ghatigaon GWALIOR
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