बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

बगुला के पँख

बगुला के पँख पहन कर 
निकल आये है 
झुंड के झुंड 
राजनीति के ज़हरीले वरसाती कीड़े 
कुछ वीर वहूटी सी 
तिरछी  लाल टोपियाँ 
कुछ लाल दुपट्टे भी 
बरगला रहे है, 
नई पीढ़ी के बच्चों को 
सिखला रहे हैं राष्ट्र द्रोह 
कुछ भी कहने की आजादी 
भारत माता को गाली भी ....!
नाच रहे हैं, 
रक्त पिपासु भेड़िये 
खड़रम् खड़रम् 
राष्ट्र भक्ति का मांस नौचते गिद्ध 
से कैसी आज़ादी है ? 
मीर जाफ़र ,जयचंदों को 
पीठ पर छुरा भौंकते 
ब्रुटस , और 
अरण्य रुदन करती 
माँ भारती ! 

  विक्रम सिंह भदौरिया 
 १८-२-२०१६ बुधवार ,ग्वालियर 

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

मधु मय वसंत

स्वागत सुखकर मधुमय वसंत ।
उसने कहा था मैं मिलूँगा 
फूलों में ,कलियों में , 
लहलहाती  अमराइयों मैं ,
प्रेमी के ह्दय की अतल गहराइयों में ,
बचपन की खिलखिलाती निश्छल हँसी मैं ,
क्योंकि मैं प्रेम हूँ , 
जो हर वार 
छले जाने के बाद  भी
 लौट आता हूँ  ,
पुन: पुन: धोखा खाने के बाद भी , 
एक बार फिर 
छले जाने की बाट मैं ..... 
स्वागत सुखकर मधुमय वसंत ....

विक्रम सिंह भदौरिया 
वसंतोत्सव 14फरवरी 2014 

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

क़यामत है

मार डाला है उन्होंने ख़ुदा को ,

मस्जिद में वैंठ् कर शैतान गा रहा है । 

वीर है हनुमंत है मृत्यु शय्या पर 

अफ़ज़ल कब्र से उठ कर 

दिल्ली पै छा रहा है । 

क़यामत है 


ओढ़ कर कफ़न वर्फ का वो वीर सो गये 

आस्तीनो में पला  तक्षक जीभ लपलपा रहा है  

कश्मीर से काशी तक कसाव ही कसाव है 

दिल्ली में गीदड़ खयाल गा रहा है 

क़यामत है 


पी कर ख़ून ग़रीबों का ,होंठ हुये है लाल लाल 

वे पैंदी का लोटा दलित की लाश पर आरक्षण गा रहा है 

किसान की कमाईँ पर मुटियाया हुआ है वो 

दाल पर प्याज़ पर मँहगाई गा रहा है 

क़यामत है 

क्या करें कोई ,जो बागड़ ही खेत खाये 

हमारे ही बोट पा कर हमें ही लतिया रहा है 

आकाओं ने विछाई थी विसात ग़ुलामों के लिये 

वो उस पर बैठ कर  हमें ही कानून सिखा रहा है 

क़यामत है 

  विक्रम सिंह भदौरिया  १२-२-२०१६

  शुक्रवार ,ग्वालियर