मार डाला है उन्होंने ख़ुदा को ,
मस्जिद में वैंठ् कर शैतान गा रहा है ।
वीर है हनुमंत है मृत्यु शय्या पर
अफ़ज़ल कब्र से उठ कर
दिल्ली पै छा रहा है ।
क़यामत है
ओढ़ कर कफ़न वर्फ का वो वीर सो गये
आस्तीनो में पला तक्षक जीभ लपलपा रहा है
कश्मीर से काशी तक कसाव ही कसाव है
दिल्ली में गीदड़ खयाल गा रहा है
क़यामत है
पी कर ख़ून ग़रीबों का ,होंठ हुये है लाल लाल
वे पैंदी का लोटा दलित की लाश पर आरक्षण गा रहा है
किसान की कमाईँ पर मुटियाया हुआ है वो
दाल पर प्याज़ पर मँहगाई गा रहा है
क़यामत है
क्या करें कोई ,जो बागड़ ही खेत खाये
हमारे ही बोट पा कर हमें ही लतिया रहा है
आकाओं ने विछाई थी विसात ग़ुलामों के लिये
वो उस पर बैठ कर हमें ही कानून सिखा रहा है
क़यामत है
विक्रम सिंह भदौरिया १२-२-२०१६
शुक्रवार ,ग्वालियर
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