गुरुवार, 24 अगस्त 2017

समर्पण

सचमुच 
मेरे शब्द पिघल उठ्े हैं 
तुम्हारी कलम की आँच से  
तपिश और जिजीविषा से 
हार कर
देखो 
हथियार जमीन पर रख दिये हैं मैने
पूर्ण समर्पण 
  विक्रम २३ -८-२०१७

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

सोमवार, 21 अगस्त 2017

तुम्हारे क़दमों की आहट

ह्दय के तारों को झंकृत करती
तुम्हारे कदमों की आहट
हवाओं और फिजांओं में घुली खुशबू 
तुम्हारे वहाँ होने के अहसास
से वाकिफ हूँ 
पर जमानै मैं और भी हैं 
जालिम, जेल और जेलर
कर्म और कर्तब्य की वेड़ियां
जो छीजतीं है
तुम्हारे वहाँ होने के अहसास को 
गुलाब की पँखुड़़ियों पर पड़ती
हथौड़े की चोट की तरह

K_vikramSingh
19-8-2017 Bhind

Posted at fB

हायकू १

उनींदी आँखे
स्वप्न भरी तरी
साहिल कहाँ----

    K_vikramsingh
22-8-2017 Kyari pura 
      Bhind (mP) 
Also posted on FB 

शनिवार, 19 अगस्त 2017

घोंघा वसंत

मैने कुछ नहीं लिखा जी 
लेकिन तुम , 
तुम तो आशु कवि हो 
यकीनन 
और में 
पेड़ की शाख पर वैठा हुआ
कालिदास का  
पूर्वार्ध .....
अपनी ही शाख को काटता हुआ 
घोंघा वसंत 
मैं ................!

Vikram singh bhadoriya
19-8-2017

सोमवार, 14 अगस्त 2017

बात कुछ वनी भी थी

बात कुछ बनी भी थी 
कि हाय तुम छिटक गयीं 
ओस की बूंद सी 
दूब पर परी खिलीं 
रश्मियाँ रवीश की
इंद्र धनुष सी बनी
तनी तनी सुहासिनी
स्मृतियों के छोर सी।

बरस के बादल चुके 
झुके झुके उदास से
पर न तुम तब रुकीं
मृग मरीचिका वनीं
रेत पर गई छली 
हाय अतृप्त प्यास सी
      K_vikramsingh
     13-08-2017
B-1176 आनन्द नगर , सागर ताल मार्ग 
ग्वालियर म.प्र भारत 
    gwalior चित्रांकन गूगल से साभार