मंगलवार, 31 मई 2016

औरत का बजूद

एक और अकविता । 

औरत का बजूद ..
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औरत का बजूद ..
एक धान के पौधे सा 
उसे बोया किसी ने 
फिर उखाड़ कर रोपा किसी ने 
सींचा किसी नाशुकरे वटाईदार ने 
काटा लूना फिर कूटा 
तिनका तिनका ,भूसा, दाना 
अलग,    अलग 
 किया किसी ने ..... 
रूँधा ,       रांधा   ,पकाया  
खाया     किसी ने ...
फिर खो गया कहीं ,
उसका बजूद ....
जो था हमेशा से ही ,
नेस्तनाबूद..................! 

                  विक्रम सिंह भदौरिया 
...................30-5-2014......
Photo सौजन्य गूगल /faminismindia से साभार 

सोमवार, 30 मई 2016

संविधान के घोंघा वंसत तुम

हे संविधान के घोंघा वसंत 
शत शत नमन् 
टीप कर विश्व के सारे विधान 
 मोती मांण्डूक्य पत्थर कुसुम 
आरक्षण  के नव निधान 
काले अँग्रेजों को करके निहाल 
बाँटो खाओ का नया मंन्त्र
आरक्षण के नव निधान 
तुमसे हारे गाँधी महान 
ज़िंन्ना के हे पादत्राण  तुम 
दलितायन के महायान 
       K_vikramSingh



शुक्रवार, 20 मई 2016

Corrupt mining act grave consequences

आज  भ्रष्ट भारतीय खनिज अधिनियम ,वन अधिनियम कानून तथा  हरित प्राधिकरण गठजोड़ व इनके तहत वनाये गये क़ानूनी नियम उपनियम के  कारण ईमानदारी से  खनन करने वालों तथा ईमानदारी से रोज़ी रोटी कमा कर अपना घर बनाने का सपना देखने वाले आम जन का जीना दूर कर रखा है । सरकार ने इन नियमों के तहत मकान बनाने में काम आने वाली रेत गिट्टी पत्थर जैसे मूल भूत  उत्पादों के खनन व विक्रय पर घोषित रूप से पूर्ण रूपेण रोक लगा कर सारी खदानें बंद कर रखी हैं । अत: एक नम्बर में सारी प्रक्रिया पूर्ण करके न तो ठेकेदार ईमानदारी से खदान का संचालन कर सकता है और न जनता का कोई गरीब आदमी  अपना मकान बनाने के लिये  एक बोरी रेत ख़रीद सकता है लेकिन नेता मन्त्री व अधिकारियों की मुट्ठी गरम करके तथा मीडिया का हफ़्ता चुकाने के बाद खदान मालिक अपनी वैध खदानों से अवैध खनन कर सकता है तथा आम आदमी अपने ख़ून पसीने की कमांई से मूल क़ीमत का दस गुना भुगतान करके अपना मकान बनाने को रेत गिट्टी ब्लैक मार्केट से ख़रीद सकता है । लेकिन एक नम्बर में कदापि  नहीं । 
   यह स्थिति वेहद ख़तरनाक   है क्योंकि इसमें भ्रष्टाचार करने के लिये बाक़ायदा कानून है और कानून के तहत वनाये गये भ्रष्टाचारोन्मुखी नियम हैं जिनका इस्तेमाल  कानून निर्माता व उनके नौकर  वड़ी वेशर्मी के साथ विल्कुल नंगे होकर कर रहे हैं । उत्तर प्रदेश तथा म. .प्र. के जो हालात मेरी जानकारी में हैं वह  अंततः: सरकार व आम जनता के बीच गृह युद्ध या जय प्रकाश नारायण जैसे जन आन्दोलन का कारण बन सकते  है ।  अत: प्रधान मंन्त्री जी समय रहते कुछ उपाय कर लें तो अच्छा है बरना यहाँ  सारा दोष आपके मत्थे मढ़े जाने की पूरी तैय्यारी है । 
Vikram singh bhadoriya 
Gwalior M.P. 
21-5- 16 

गुरुवार, 5 मई 2016

एक अकेला आदमी

 उँ  "नमो " भगवते वासुदेवा: 

एक अकेला आदमी 
चला जा रहा है 
बोझा उठाये ,अनवरत  ,अथक 
 साथ सवा अरब 
कुछ उमंग भरे युवा 
कुछ बोझिल और अपाहिज, 
कुछ सिरफिरे अहँकारी प्रेतों की 
बदबूदार लाशें,
उठाये हुये 
उसके वह दृढ़ स्कंध 
दृढ़ संकल्प लिये 
चल रहा है वो
अनवरत 
विना थके विना रुके 
पाँव दर पाँव 

कुछ देश द्रोही समाज कंटक भी हैं ,
यहाँ 
जो उग आये हैं पाँव में ,  छालों की तरह ,
पीर वन कर 
एक मूर्ख मण्डल पार्टी की वेड़ियाँ भी हैं 
साथ में 
बँधे हुये घायल पाँव लिये 
चला जा रहा है 
वो अकेला अहर्निश 

न पास कोई छाँव है 
न पास कोई ठाँव है 
न साथ  कोई साथी है 
कुछ महा मूर्खो के सिवा 

बस एक ज़िद है 
एक ज्योति  है ,जो 
अहर्रनिश ज्वाजल्यमान 

दिल में 
एक चाहत है ,एक टीस सी 
जो  उठती है 
रह रह कर 
एक हूक बन कर 


पतन के गर्त में 
डूबे हुये भारत को 
स्वाभिमान व सफलता के
 स्वर्णिम उज्जवल शिखर तक
खींच ले जाने की 
एक चाहत ,निर्विकल्प । 
    ---k_vikramsingh

Re edited on 15-5-2016 
DRPL GWL posted on 19-9-2017



बुधवार, 16 मार्च 2016

औरत का बजूद

एक और अकविता । 

औरत का बजूद ..
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औरत का बजूद ..
एक धान के पौधे सा 
उसे बोया किसी ने 
फिर उखाड़ कर रोपा किसी ने 
सींचा किसी नाशुकरे वटाईदार ने 
काटा लूना फिर कूटा 
तिनका तिनका ,भूसा, दाना 
अलग,    अलग 
 किया किसी ने ..... 
रूँधा ,       रांधा   ,पकाया  
खाया     किसी ने ...
फिर खो गया कहीं ,
उसका बजूद ....
जो था हमेशा से ही ,
नेस्तनाबूद..................! 

                  विक्रम सिंह भदौरिया 
...................30-5-2014......

मंगलवार, 8 मार्च 2016

काव्योदय केपृष्ठ पर

विश्व नारी दिवस पर काव्योदय के पीठ पर लिखी एक अकविता ... 

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मातृ सत्ता की गरिमा का असर 

राम की सरपरस्त वन करती वसर, 

कृष्ण की माँ बनने तक का सफर , 

वो कौशल्या नंदन वो यशोदा का पुत्तर 

राम की वो शक्ति पूजा 

वो महिषासुर     मर्दिनी 

वो अर्ध नारीश्वर  शिवा 

वो शिव की अर्धांगिनी 


 वो सीता केअनुगामी सीताराम 

वो राधे के  अनुगामी राधेश्याम 

कहाँ गये सब 

कहाँ गया वह गौरव , 

वो राह में कब रुकी 

वो राह में कब थकी 

कि ठाँव ठाँव गई छली 

 रह गई पीछे वो सदी सदी 

निकल गया आगे 

सीता का श्री राम वह

राधा का घनश्याम वह  

कहाँ और कब छली गई वो 

राधा छलिया कृष्ण से 

सीता सनातन  पुरूष दम्भ से 

जुये में नीलाम पाँचाली की अस्मिता

तार तार अंत: वस्त्र , 

तार तार स्वाभिमान 

पाँडु पुत्रों की अनुगामनी 

बनने की सज़ा 

भुगतती वो मानिनी 

अग्नि दग्धा कोख से उत्पन्न वो 

दीप शिखा ज्वाजल्यमान 

स्वयं पराजिता आज वह अपराजिता 

किस से कहे अाज वह निज व्यथा  

उसे तो बस अपनों ने ही छला । vikram singh bhadoriya 

8-3-2016 

Bhind


बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

बगुला के पँख

बगुला के पँख पहन कर 
निकल आये है 
झुंड के झुंड 
राजनीति के ज़हरीले वरसाती कीड़े 
कुछ वीर वहूटी सी 
तिरछी  लाल टोपियाँ 
कुछ लाल दुपट्टे भी 
बरगला रहे है, 
नई पीढ़ी के बच्चों को 
सिखला रहे हैं राष्ट्र द्रोह 
कुछ भी कहने की आजादी 
भारत माता को गाली भी ....!
नाच रहे हैं, 
रक्त पिपासु भेड़िये 
खड़रम् खड़रम् 
राष्ट्र भक्ति का मांस नौचते गिद्ध 
से कैसी आज़ादी है ? 
मीर जाफ़र ,जयचंदों को 
पीठ पर छुरा भौंकते 
ब्रुटस , और 
अरण्य रुदन करती 
माँ भारती ! 

  विक्रम सिंह भदौरिया 
 १८-२-२०१६ बुधवार ,ग्वालियर