बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

बगुला के पँख

बगुला के पँख पहन कर 
निकल आये है 
झुंड के झुंड 
राजनीति के ज़हरीले वरसाती कीड़े 
कुछ वीर वहूटी सी 
तिरछी  लाल टोपियाँ 
कुछ लाल दुपट्टे भी 
बरगला रहे है, 
नई पीढ़ी के बच्चों को 
सिखला रहे हैं राष्ट्र द्रोह 
कुछ भी कहने की आजादी 
भारत माता को गाली भी ....!
नाच रहे हैं, 
रक्त पिपासु भेड़िये 
खड़रम् खड़रम् 
राष्ट्र भक्ति का मांस नौचते गिद्ध 
से कैसी आज़ादी है ? 
मीर जाफ़र ,जयचंदों को 
पीठ पर छुरा भौंकते 
ब्रुटस , और 
अरण्य रुदन करती 
माँ भारती ! 

  विक्रम सिंह भदौरिया 
 १८-२-२०१६ बुधवार ,ग्वालियर 

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