मंगलवार, 8 मार्च 2016

काव्योदय केपृष्ठ पर

विश्व नारी दिवस पर काव्योदय के पीठ पर लिखी एक अकविता ... 

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मातृ सत्ता की गरिमा का असर 

राम की सरपरस्त वन करती वसर, 

कृष्ण की माँ बनने तक का सफर , 

वो कौशल्या नंदन वो यशोदा का पुत्तर 

राम की वो शक्ति पूजा 

वो महिषासुर     मर्दिनी 

वो अर्ध नारीश्वर  शिवा 

वो शिव की अर्धांगिनी 


 वो सीता केअनुगामी सीताराम 

वो राधे के  अनुगामी राधेश्याम 

कहाँ गये सब 

कहाँ गया वह गौरव , 

वो राह में कब रुकी 

वो राह में कब थकी 

कि ठाँव ठाँव गई छली 

 रह गई पीछे वो सदी सदी 

निकल गया आगे 

सीता का श्री राम वह

राधा का घनश्याम वह  

कहाँ और कब छली गई वो 

राधा छलिया कृष्ण से 

सीता सनातन  पुरूष दम्भ से 

जुये में नीलाम पाँचाली की अस्मिता

तार तार अंत: वस्त्र , 

तार तार स्वाभिमान 

पाँडु पुत्रों की अनुगामनी 

बनने की सज़ा 

भुगतती वो मानिनी 

अग्नि दग्धा कोख से उत्पन्न वो 

दीप शिखा ज्वाजल्यमान 

स्वयं पराजिता आज वह अपराजिता 

किस से कहे अाज वह निज व्यथा  

उसे तो बस अपनों ने ही छला । vikram singh bhadoriya 

8-3-2016 

Bhind


बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

बगुला के पँख

बगुला के पँख पहन कर 
निकल आये है 
झुंड के झुंड 
राजनीति के ज़हरीले वरसाती कीड़े 
कुछ वीर वहूटी सी 
तिरछी  लाल टोपियाँ 
कुछ लाल दुपट्टे भी 
बरगला रहे है, 
नई पीढ़ी के बच्चों को 
सिखला रहे हैं राष्ट्र द्रोह 
कुछ भी कहने की आजादी 
भारत माता को गाली भी ....!
नाच रहे हैं, 
रक्त पिपासु भेड़िये 
खड़रम् खड़रम् 
राष्ट्र भक्ति का मांस नौचते गिद्ध 
से कैसी आज़ादी है ? 
मीर जाफ़र ,जयचंदों को 
पीठ पर छुरा भौंकते 
ब्रुटस , और 
अरण्य रुदन करती 
माँ भारती ! 

  विक्रम सिंह भदौरिया 
 १८-२-२०१६ बुधवार ,ग्वालियर 

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

मधु मय वसंत

स्वागत सुखकर मधुमय वसंत ।
उसने कहा था मैं मिलूँगा 
फूलों में ,कलियों में , 
लहलहाती  अमराइयों मैं ,
प्रेमी के ह्दय की अतल गहराइयों में ,
बचपन की खिलखिलाती निश्छल हँसी मैं ,
क्योंकि मैं प्रेम हूँ , 
जो हर वार 
छले जाने के बाद  भी
 लौट आता हूँ  ,
पुन: पुन: धोखा खाने के बाद भी , 
एक बार फिर 
छले जाने की बाट मैं ..... 
स्वागत सुखकर मधुमय वसंत ....

विक्रम सिंह भदौरिया 
वसंतोत्सव 14फरवरी 2014 

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

क़यामत है

मार डाला है उन्होंने ख़ुदा को ,

मस्जिद में वैंठ् कर शैतान गा रहा है । 

वीर है हनुमंत है मृत्यु शय्या पर 

अफ़ज़ल कब्र से उठ कर 

दिल्ली पै छा रहा है । 

क़यामत है 


ओढ़ कर कफ़न वर्फ का वो वीर सो गये 

आस्तीनो में पला  तक्षक जीभ लपलपा रहा है  

कश्मीर से काशी तक कसाव ही कसाव है 

दिल्ली में गीदड़ खयाल गा रहा है 

क़यामत है 


पी कर ख़ून ग़रीबों का ,होंठ हुये है लाल लाल 

वे पैंदी का लोटा दलित की लाश पर आरक्षण गा रहा है 

किसान की कमाईँ पर मुटियाया हुआ है वो 

दाल पर प्याज़ पर मँहगाई गा रहा है 

क़यामत है 

क्या करें कोई ,जो बागड़ ही खेत खाये 

हमारे ही बोट पा कर हमें ही लतिया रहा है 

आकाओं ने विछाई थी विसात ग़ुलामों के लिये 

वो उस पर बैठ कर  हमें ही कानून सिखा रहा है 

क़यामत है 

  विक्रम सिंह भदौरिया  १२-२-२०१६

  शुक्रवार ,ग्वालियर 

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

हिन्दी के विकास के लिये

प्रिय हितेश शर्मा जी आपकी चिंता बाजिब है लेकिन तमिलनाडु में  हिन्दू संस्कृति आज भी जीवित है और वह हम उत्तर भारतियों की तुलना में कहीं श्रेष्ठ हिन्दू है । जहाँ हम माथे पर तिलक लगाने व धोती पहनने में संकोच करते है , वहीं  तमिलनाडु में सूट बूट पहनने  बाले ब्यक्ति भी माथे पर रोली चन्दन का विन्दी तिलक या त्रिपुंड और गले में तुलसी की माला ज़रूर पहनते हैं और ऐसा करने में गर्व का अनुभव करते है । 
 दक्षिण के मूर्ख नेताओं ने नहीं दुष्ट नेताओं ने हिन्दू विरोध व ब्राह्मण विरोध को अपना हथियार अपनी घृणित व विघटन कारी राजनीति चमकाने के लिये बनाया  , साथ ही हिन्दू धर्म व संस्कृति  के विरोध के लिये यह ज़रूरी था कि संस्कृत और हिन्दी का विरोध किया जाय । क्योंकि हिन्दी व संस्कृत पढ़ा हुआ  ब्यक्ति मौक़ा मिलने पर ,हिन्दू धर्म  व  साहित्य पढ़ लिये जाने पर इन नेताओं की असलियत जान लेने का पूरा ख़तरा मौजूद था । इसलिये जानबूझ कर  ब्राह्मण , संस्कृत व हिन्दी बोलने वाले हर हिन्दू को अपमानित किया गया । 
 हमारे केन्द्र के आज़ादी बाद के नेता भी ईमानदार नहीं थे । इन्होंने प्रांतों का बँटवारा भी फूट डालो राज करो की नीति पर ही भाषा के आधार पर प्रांतों का सीमांकन किया था । ताकि  भारत गण राज्य में कभी भी एक संम्पर्क भाषा के तैर पर हिन्दी को प्रतिष्ठापित न किया जा सके । इसके साथ ही  हिन्दी दिवस व विश्व हिन्दी दिवस जैसे आयोजन करके ग़ैर हिन्दी भाषी जनता के मन में उनकी अपनी मातृभाषा के विलुप्त हो जाने का डर एक सोची समझी नीति  व राष्ट्र विरोधी षणयंन्त्र के तहत विठाल दिया गया था । जिसमें हिन्दी व ग़ैर हिन्दी भाषी दोनों प्रकार के नेता शामिल थे । 
  हिन्दी का विकास अँग्रेजी केविकास की राह पकड़ कर व अँग्रेजी के विनाश के साथ ही सम्भव है । यह कार्य Narendra Modi और स्मृति ईरानी चाहें तो मात्र चार साल वचे हैं उनके पास , उनके कार्यकाल में कर सकते है और वो भी विना कोई हिन्दी सम्मेलन का प्रेपेगंडा किये बग़ैर । इसके लिये मेरे निम्न सुझाव हैं । 
१. हिन्दी भाषा का नाम लिये बग़ैर सारे भारत में आयोजित होने वाली प्रांन्तीय व केन्द्रीय नौकरी के लिये  प्रतियोगी परीक्षाओं में  उत्तर लिखने का माध्यम सिर्फ संविधान की आठवीं अनुसूची मैं दर्ज १५भाषाओं में से किसी एक भाषा ही लिखा जाना अनिवार्य कर दिया जाये । 
      २.किसी भी प्रादेशिक नौकरी की परीक्षा में अँग्रेजी का पेपर नहीं रखा जाय वल्कि उसकी जगह पर   उस प्रदेश की मातृभाषां का सामन्य व सरल   ज्ञान का पेपर के साथ अँग्रेजी के स्थान पर प्रादेशिक मात्र भाषा से इतर संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज भाषाओं में से एक भाषा का सरल पेपर । का  अनिवार्य  कर दिया जाय । 
    ३. सभी upsc व केन्द्र शासित प्रदेशों  की नौकरी के लिये आठवीं अनुसूची की १५ भाषाओं में से एक भाषा का एक अनिवार्य  पेपर तथा  दूसरी भाषा के वतौर एक पेपर सरल हिन्दी भाषा का अनिवार्यत: रखा जाय । 
  स्कूलों व कालेज में उनकी मान्यता वनाये रखने के लिये हर संस्था में   सभी संविधान सम्मत  भारतीय भाषाओं के टीचर रखा जाना अनिवार्य किये जाने के साथ ही प्रायमरी से लेकर पोस्ट ग्रेजुएट क्लास (तक चाहे वह किसी भी विषय की क्लास हो) अपनी मातृ भाषाके साथ एक भारतीय भाषा की पढ़ाई अनिवार्य करने के साथ ही यह व्यवस्था भी की जाय कि भाषा की परीक्षा में फ़ेल होने पर श्रेणी पर कोई प्रभाव नहीं पड़े लेकिन अधिक नम्बर आने पर परीक्षा परिणाम में श्रेणी सुधार के लिये भाषा के अतिरिक्त मार्क्स जोड़े जा सकें । 

 संविधान व क़ानूनों की किताबों में किसी अर्थ मैं विवाद की स्थिति में वर्तमान में    जो अभी अँग्रेजी वर्जन को शुद्ध व अंतिम सत्य माना जाता है । यह परिपाटी ख़त्म करके इसके बजाय हिन्दी वर्जन को ही प्रामाणिक माना जाय इस हेतु तथा 
 सभी प्रादेशिक न्यायालय व उच्च न्यायालयों की भाषा अनिवार्य रूप से उसी  प्रदेश की ही भाषा हो जहाँ वह न्यायालय स्थित है,  तथा सर्वोच्च न्यायालय की भाषा अनिवार्यत: हिन्दी ही हो । इस हेतु सर्वोच्च न्यायालय से चर्चा करके लोक सभा में प्रस्ताव पारित करके या न्यायालय से आदेश जारी करवा कर व्यवस्था की जाय । 
  उपरोक्त तरकीब से हम सिर्फ पाँच साल मैं न सिर्फ हिन्दी का वल्कि देश की सभी संवैधानिक भाषाओं का समग्र विकास करते हुये हिन्दी को केन्द्रीय भाषा व राष्ट्रीय  एकता की वाहक भाषा के रुप में स्थापित करने में सक्षम  हो सकते है ।
Vikram singh bhadoriya 
२८-११-२०१५ 
रामेश्वरम् तमिलनाडु , स्वयं की Fb post पर@हितेश शर्मा के कमेंट के उत्तर पर लिखी गई 

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

ख़यालों की झील के उस पार

ख़यालों की झील के उस पार 

यादों की झिलमिल में 

पसरा हुआ  नि:शब्द कुहासा 

उदास है , 

तुम्हारी ही तरह 

कभी चमक उठता है 

विस्तीर्ण काल मेघों की ओढ़नी की कोर पर 

टाँकी गई श्वेत धवल चाँदनी सी 

तुम्हारी ही याद की तरह ... 

........vikram singh bhadoriya ......

           21-dec -2015 Gwalior 

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

चोर और गाय माँस भक्षण के समर्थन में साहित्यकारों व वैज्ञानिकों का हाहाकार

पुष्प पद्म भूषण और ज्ञान पीठ पुरुस्कार लौटाने वालों का काला सच 

 सीरीज़ -१ 

  ये है महान वैज्ञानिक पद्म विभीषण  पुष्प मित्र भार्गव (@pushp mitra Bhargav ) इन्होंने 1984 में 2800 सिखों के नरसंहार और इसके भी पहले पंजाब में आतंकियों द्वारा कलबुर्गी की तरह चुन चुन कर मारे गये बिचारकों व बुद्धिजीवियों की हत्याआों  से प्रसन्न होकर सन् 1985 मैं इन हत्याओं के लिये ज़िम्मेवार कांग्रेस की ख़ूनी सरकार के हाथों  पद्म भूषण पुरुस्कार ग्रहण किया था ।  

       फिर जब 19  जनवरी  1990 की रात जब कश्मीर में हिन्दू कश्मीरी पण्डितों का भीषण नरसंहार किया  गया था , तब इनकी आत्मा गूँगी और बहरी होकर मरी पड़ी थी । 

         27फरवरी 2002 को जब 59 हिन्दू गोधरा में ट्रेन में ज़िंदा जला दिये गये थे तथा इसके बाद हुये दंगों में तमाम हिन्दू व मुसलमान तवाह हो गये थे  तब भी इनकी आत्मा पुरुस्कार पर पुरुस्कार पाकर पिशाच की तरह नृत्य कर रही थी । 

जो फिर  20 अगस्त 2013 को नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या के बाद तीन साल तक शायद कान में तेल डाल कर सोती  रही थी । 

          जो February 20,2015 को श्री गोविंद पनसारे की हत्या के नौ माह बाद तक और 

         30 अगस्त  2015 को  प्रोफ़ेसर श्री एम एम कलबुर्गी  की नृशंश हत्या के एक माह बाद तक भी  नहीं जागी । 

         पर 30 september 2015  को एक चोर और गाय की हत्या कर माँस खाने बाले की पिटाईँ पर इनकी छाती फट गई आत्मा हाहाकार कर उठी और इन्होंने अपना कांग्रेस सरकार का दिया हुआ पद्मभूषण का तमग़ा भाजपा की मोदी सरकार को लौटा दिया  है । 

 क्योंकि उपरोक्त नरसंहारों में मारे गये लोग सिख हिन्दू और मुसलमान थे जो इनकी दृष्टि में गाय की तरह सिर्फ़ जानवर थे और गाय चोरी करके व काटकर खाने वाला एक मात्र इंसान था । सो बहुत सारे महान व गाय के माँस से तृप्त होने वाले  साहित्यकारों की पिशाच आत्मायें यकायक रुदन कर उठीं और पुरुस्कार बापसी की होड़ मची हुयी है । 

 मैं अपने #facebook  व #G+ के  मित्रों से अनुरोध करता हूँ कि वह इन नराधम साहित्यकारों के काले इतिहास को खोज कर बेनक़ाब करें । 

। पुष्प मित्र भार्गव वैज्ञानिक