मंगलवार, 4 जुलाई 2017

गुरिन्दर दी सिपियाँ अहसास दीं

    
      

      डाॅ गुरिन्दर गिल "गौरी " जब भी कुछ लिखतीं हैं वह मुझे समालोचना के लिये ज़रूर भेजती है । पर यह मेरा दुर्भाग्य ही था कि उसकी "नग़मा -ए-ज़िंदगी "     के वाद प्रकाशित काव्य संग्रहों का मैं प्रमाद वश आलोचनात्मक अध्ययन करने से महरूम रहा हूँ । इसके लिये मुझे गुरिंन्दर की नाराज़गी भी झेलनी पड़ी व उलाहना भी सुनना पंड़ा ।इस नाराज़गी के बावजूद भी ,अभी कुछ दिन पहले उसने अपने नये प्रकाशनाधीन काव्य संग्रह "सीपियाँ एहसास की " की सभी कवितायें ई मेल से भेजीं हैं और साथ में धमकी भी दी है कि अगर इस वार मैंने उन्हें पढ़ कर अपनी अभिव्यक्ति टीप नहीं भेजी तो वह ज़िंदगी भर मुझसे बात नहीं करेगी ।
        मेरी प्यारी यह नकचढ़ी बहन गुरिंन्दर जब भी लिखने वैठती है तो वह हड़बड़ी में अक्सर यह भी भूल जाती है कि, कौन साथ चला कौन पीछे छूट गया । किसको धौल पड़ी और किसको टँगड़ी मारी ,उसके "शब्दों के सफर " में सारे के सारे विचार ,एहसास ,छंन्द और लय सब कुछ गड्डमगड्ड  व चकरघिन्नी होते नज़र आते है । लिखते वक़्त उसे बस एक ही फ़िक्र रहती है कि कहीं कोई एहसास कोई  "राज ए दिल " कोई भी भावावेश कागद पर उकेरे जाने से बच न पाये । 
     यूँ तो सीपियाँ चुनने व सहेजने का शौक़ उसे बचपन से ही रहा है । जब वो माँ के साथ अमृतसर में हरमन्दिर साहब में मत्था टेकने जाती थी तब वहाँ के अमृत सरोवर में डुबकी लगा कर छोटी -छोटी सीपियाँ ढूँढ कर निकाल लाती,खेल खेल में ही उन सीपियों में मानवीय अहसास की कल्पनाओं के मोती सजाती , उन्हें  सवाँरती ,जब शादी के बाद वह मलय एशिया पहुँची तो वहाँ भी उसने लातार दातू की "भाषा" के समन्दर की मनचली लहरों द्वारा समय के साहिल पर छितरा दी गईं मानवीय संवेदनाओं की सीपियों को चुनना व सहेज कर रखना अपना शग़ल बना लिया ,और आज उसकी चुन चुन कर सहेजी गईं ये सीपियाँ मानवीय अहसासों  के साहित्यिक मोतियों से लवरेज हैं । 
      अमृत सरोवर से ली गई   "पंजाबी " की मिठास ,लखनऊ की "उर्दू " की नफ़ासत के साथ लातार दातू की  "भाषा"  के समन्दर के ख़ारेपन का अहसास लिये ,डाॅ.गुरिंन्दर गिल "गौरी" की यह काव्य रचनाओं के मोतियों से भरी सीपियाँ उसकी क़लम के आवे- जमजम  के काव्य  निर्झर से  नि:सृत कल कल निनाद करती  सरिता में , व-रास्ते  "राज-ए-दिल"  प्रवाहित होतीं  व " नग़मा-ए-ज़िंदगी "(२०१४) "इस मुक़ाम पर "(२०१५) "करम फरमाई "(२०१६) के  "शब्दों के सफर" (२०१७)में प्रवाहमान गुरिन्दर की सद्य:प्रकाशित यह   "सीपियाँ एहसास कीं " सचमुच अपने आप में सागर को समाहित किये हुये हैं । सास्नेह । 
         इस काव्य संग्रह में उसकी कविताओं में "वक़्त को मुट्ठी में बंद कर लेने की ख़्वाहिश " "दीन ओ ईमान  की वातों "में क़त्लेआम आम मचाने का दर्द ,अपनी मात्ृ भूमि पर नेताओं के हुड़दंग पर आक्रोश " जब भी देखूँ मैं अपने हिंन्दुस्तान को " में ध्वनित हुआ है तो " पत्थर के घरों में रहते पत्थर " मैंने देखा है सड़क पर चीथड़ों में लिपटी लाश " , में जहाँ सारे जहाँ का दर्द का एहसास कवियत्री की क़लम को दर्द लिखने को वेताव वेगास किये दिखता है , वहीं " कहाँ से आरहा है इंसान " कविता में वह वेद व उपनिषदों के सृष्टि व समष्टि के उद्भव  के विषय पर भी गंम्मीर से अपने विचार रखती है । लेकिन इस सब के बावजूद वह अपनी क़लम की असमर्थता से वेगार लिखती है कि  " मेरे लफ़्ज कहते हैं चीख़ चीखँ कर ,कि मैं लिखूँ मगर मुझे लफ्जों से नहर सजाना नहीं आता "  यह मानवीय संवेदनाओं को जस का तस कागद पर उकेरने की उसकी तड़प ही है जो गुरिंन्दर की क़लम की धार को कभी कुंन्द नहीं पड़ने देती । साधुवाद । सास्नेह  । 
  
                       विक्रम सिंह भदौरिया
                   B-1176 आनन्द नगर,वहोड़ापुर 
                    सागर ताल मार्ग , ग्वालियर ,         
                      ( मध्य प्रदेश ) भारत 

मंगलवार ,१३ जून २०१७ ग्वालियर

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मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

हिंदी भाषा का नया पिंगल शास्त्र

आदरणीय Mahesh Katare Sugammahesh जी छन्द पढ़ कर विना समझे भी वाह वाह करना जितना सरल है छन्द रचना करना उतना ही कठिन है फिर छन्द रचना के साथ भाव प्रवाह भी वनाये रख पाना तो सिर्फ उन्हीं कवियों के लिये संभव है जिन पर कृपा राम की होही !  
  पर मेरे जैसे मूसर चंद अकवि के लिये तो यह वहुत दूर की कौड़ी है , नाच न आवे आँगन टेढ़ा वाले भाव के अनुसार छन्द को दोष देकर वैठ जाने के वजाय टेढ़े आगन मैं ही बंदर कूदनी नाच नाचने में मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती ा 
 विना छन्द के भी कविता की जा सकती है यह महाकवि निराला पहले ही सिद्ध कर चुके है ।पर विना भाव प्रवाह के कविता जो कि आज के  तथा कथित कवि व चुटकले वाज लिखते है उसे कविता की श्रेणी में तो क्या गद्य की श्रेणी में भी नहीं रखा जा सकता । इसलिये आज जरूरत इस बात की है कि जो भी मूर्धन्य अत्प सख्यक कवि साहित्य जगत में शैष है उनकी एक उच्च स्तरीय कमेटी गठित की जाय व पिंगल शास्त्र में शास्त्रीय छंन्द विधा के नये उप विभाग वना कर उसमें १,बंदर कूदनी छंन्द ,२,कचर कचरा छंन्द ,३पद दलित विगलित छंन्द ४,झकझकिया छंन्द और मूसर चन्दा छंन्द विधा को भी नव हिन्दी पिंगल शास्त्र में प्रतिष्ठित किया जाने की  कृपा की जाय । निवेदक 
Vikram singh bhadoriya 
11-4-2017 Bhind 

रविवार, 12 मार्च 2017

होली २०१७मार्च१२

सुरमई नयनों की कोर से 
रतनारे रुखसारों की लाली
लेकर यह मधुमय वसंत ,
चढ़ आया है देखो पंचसर ,
 ले पुष्पराग यह धनुष तान,
घायल कर डाले सब ह्रदय त्राण
फिर भी है उन्मत्त ,यह प्राण प्राण 
उड़ते फिरते हैं ले रंग संग 
गालों पर मलते गुलाल ....
स्वागत प्रिय सुखकर वसंत ....!
--Vikram singh bhadoriya 
    Holi 12 march 2017 
Photo courtesy Dr Neetu Sikarwar

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

नया साल मनाने के ईसाई ,मुस्लिम व हिन्दू सोच

Happy New Year  पर एक नई खोज .
.......,..
अब ग्रेगेरियन कलेंडर के नये साल की शुरूआत
में वस चंद एक घंटे वाकी है पर एक सवाल कई सालों से मन में घुमड़ रहा था  कि आखिर नया साल  मनाते क्यों है ? तो गूगल बाबा से  पूछ ने की ग़ुस्ताख़ी कर बैठे । और गूगलबाबा ने ढोल की पोल क्या खोली कि बस यूँ समझो कि  ढोल ही फूट गया । बोले नया साल यानि एक जनवरी को ईसा मसीह का नाम करण संस्कार किया गया था  व ख़तना किया गया था सो इसी खुशी में सारे ईसाई एक जनवरी को बहुत उत्साह व समारोह पूर्वक एक जनवरी सैलिब्रेट करते है । 
   अब ईसाई ईसा मसीह को ख़तना किये जाने पर ख़ुश और मुसलमान यह सोच कर ख़ुश कि कम से कम ईसाइयों का मसीहा तो हमारी तरह ख़तना किया गया सो नये साल में ख़तना भाई की जय और इसी बहाने नई साल में इस्लाम में   हराम शराब माई की जय बोलते है !!!! 
    पर एक सबाल अभी भी अनुत्तरित था कि ईसाई और मुसलमान ख़तना करवाने की  ख़ुशी मनायें सो तो ठीक है पर हिन्दू विना ख़तना करवाये ही "
बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना " क्यूँ हो जाता है ? ??  बहुत सेंकने पर दिमाग़ से निकली आँच ने बताया "ग़ुलाम और मालिक का फ़ंडा " यानि १००० साल हमारे मालिक रहे मुसलमान और ४०० वरस हमारे मालिक रहे अँग्रेज ईसाई , सो अगर अपने अब्बा हुज़ूर का ख़तना करवाने की ख़ुशी में मालिक नाचे तो हम ग़ुलाम अपनी वफादारी दिखाने को क्यों ना नाचें ????? सो हम तो नया साल का पहला दिन और हमारे आका के आका के नाम करण व आका के ख़तना पर जी खोल कर नाचते अा रहे है आज भी दारू पीकर दिल खोल कर नाचेंगे व वधाइयाँ गायेंगे । फटाके भी चलायेंगे क्योंकि दीवाली को इन्हीं फटाकों को  हमने अपने भाई बड़े ग़ुलाम अली हाई कोर्ट व ससुर सुपरीम कोरट के कहने पर अपने दिमाग़ से  ग़ुलाम हिन्दू भाई जान की बड़ी वैज्ञानिक प्रदूषण सोच के खरदूषणों के कहने पर अपने नन्हे मुन्नों तो फोड़ने देना तो दूर छूने भी नहीं दिया था । पर लार तो हम भी वहुत टपकाये थे फोड़ने फुडबाने की ख़ातिर । सो आज न हम मानेंगे भइ्य्यन चाहे ससुरवा सुपरीमा कोरट वा भेज दे हमें जेल में । सो सब का नया मुबारिक कहते है   ,, अरे नाहीं ....  हम कहा आप सबन का  हैप्पी न्यू ईअर ।।।। :
Vikram singh bhadoriya 
Aanand Nagar Gwalior 
Re written on 31st Dec 2016

बुधवार, 30 नवंबर 2016

गुरिन्दर के "शब्दों के सफर "पर कमैंट

     पाँच साल पहले @Dr Gurinder Gil "Gauri " की पहली कविता जो मैंने पढ़ी "ज़िंदगी " नाम से ही थी । जो ज़िंदगी का फ़लसफ़ा लिये उगते हुये प्रेम का एक अँखुआ ,सुनहरी धूप में गुनगुनाता पल्लवित होता" प्रेम वृक्ष " फिर बुढ़ापे  की तरफ़ लम्बे लम्बे डग भरता , जीवन के संघर्ष से थका हारे प्रेम पथिक और अंत में उड़ती हुई शम्शान की राख के साथ अनन्त के अथाह सागर में विलीन होती ज़िंदगी का फ़लसफ़ा लिये.   यह  अकेली कविता ही  मानो भविष्य के उनके कविता संग्रह "राज- ए- दिल " (सन् २०१३ ) ,नग़मा -ए-दिल ( २०१४)  "इस मुक़ाम पर " ( २०१५ ) तथा इसी वर्ष प्रकाशित सूफ़ियाना "करम फरमाई " के बाद अब सन् २०१६ में ही सद्य:प्रकाशित व व  पंजाब कला एवं साहित्य अकादमी "पंकस" केमँञ्च से लोकार्पित इस कविता संग्रह  "शब्दों के सफ़र "में प्रतिबिम्बित हो रही थी।  


 "शब्दों का सफर "  में सन्नहित "गौरी " गुरिन्दर गिल की कबिताये ं भी पाठक को  कभी उगते हुये सूरज की स्वर्णिम लालिमा और मलयज पवन की शीतल सुगंधित वयार सा आभास लिये  " ... तो कभी

    दोपहर की चिलचिलाती धूप में तपते हुये लाल लाल आँखों वाले सूरज तले ज़िंदगी के संघर्ष मैं प्यार और मनुहार और तमस की धूप छाँव लिये कसमसाती हुई ज़िंदगी के गीत गाती हुंईं मिलतीं हैं , 

   तो कहीं शाम को थके पाँव घर लौटते हुये श्रमिक की क्लांत वेदना लिये तो कभी ,अल्लाह की याद में अजान के गूँजते हुये स्वर , उनींदी आँखों से सृष्टि को निहारते , नींद से बोझिल पलकें लिये  विश्राम कक्ष की ओर जाते हुये   शाम के  सूरज और  समुद्र की रेत पर गिर कर छपाक की ध्वनि के साथ शांत होती समुद्री लहरों के स्वर सा अहसास कराती हैं ।             सूफ़ियाना कविताओं का " यह शब्दों का (सुहाना ) सफर " सचमुच में   डाॅ. गुरिंन्दर गिल "गौरी " की कविताओं के रूझान , उत्थान व चरमोत्कर्ष की ओर जाती हुई, हिन्द के पंजाब से मलय एशिया तक हिन्दी साहित्य की सेवा में लीन"एम्बेसडर आॅफ हिंन्दी " अवार्ड से विभूषित  कवियत्री की कविता के सफ़र के सफ़रनामा का । ...... यह सार संक्षेप है । 

  ईश्वर से प्रार्थना है । यह मलेशियाई हिन्दी साहित्य के माथे की विंदी में टाँकी गई हीरक कणिका सी यह कवियत्री "गौरी " गुरिन्दर गिल हिंन्दी  साहित्य के आकाश में चमकता सूरज बने । एवमस्तु ।। 


     


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मंगलवार, 22 नवंबर 2016

प्रधान मंन्त्री को सुझाव

भारत में political system और चुनाव तन्त्र का ढाँचा  पूरी तरह भ्रष्टाचार की कमाई व व्लेक  मनी पर आधारित है। कांग्रेस की कार्वन कापी वनने की कोशिश में भाजपा भी इससे अछूती नहीं रही  है इसलिये पार्टी के लोग भी आपसे डरे हुये हैं । अत: राजनीति से ब्लेकमनी ख़त्म करने के लिये चुनाव सुधार अतिआवश्यक है और इसके लिये आगे आपको वहुत कठिन परिस्थियों से गुज़रना होगा । ब्लेकमनी का ९०%राजनैतिक पार्टियों व इनके नेताओं  के पास ही है । जो आपके सर्जिकल स्ट्राइक से तिलमिलाये हुये हैं हालाँकि डिमोनिटाइजेशन से   इनकी निजी काली कमाई  पर अभी भी वहुत थोड़ा असर ही पड़ा है । इस कालीमनी को समूल नष्ट नहीं किया जा सकता जब तक कि आप  सभी राजनैतिक पार्टियों व इनके नेताओं  व प्रत्येक पदाधिकारी की आमद ख़र्च का एक एक पैसे का हिसाब व आडिट करना अनिवार्य नहीं कर देते । अगर ऐसा हुआ तो 90%राजनेता अपनी दुकान बंद करके राजनीति से ही बाहर होजायेंगे । होसकता है भाजपा के भी कई नेता आपसे रुष्ट होजायें पर   इससे देश का वहुत भला होगा । 
   टैक्स राजा के द्वारा जनता से वसूले गये कर को कहते हैं हमारे यहाँ उल्टे राजा के नौकर राजा से कर वसूल करते है और उसके सामने  टैक्स  का हौआ खड़ा करके चोरी करने के तरीक़े वताते है । 
  क्या ऐसा नहीं हो सकता कि टैक्स का नाम बदल कर उसे "राष्ट्र विकास सहयोग राशि " कहा जाय ताकि कर दाता को वह आत्म गौरव व सम्मान हासिल हो सके जो वह राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में व राष्ट्रीय आपदा के समय दिये गये दान के समय महसूस करता है ? 
 १००% जन संख्या को "राष्ट्र सहयोग निधि में योगदान " (  डायरेक्टर टैक्स ) के दायरे में लाया जाय तथा आय का एक निश्चित हिस्सा राष्ट्र हित में दान करना अनिवार्य किया जाय । रिटर्न भरने के वदले हर कर दाता को  धन्यवाद पत्र लिख कर यह लिखित में वताया जाय कि उसकी सहयोग राशि किस मद में कहाँ उपयोग में लाई गई है । 
           Indirect tax को धीरे धीरे कम किया जाय । सेल टैक्स व सेवा कर जैसे टैक्स की शत प्रतिशत वसूली के लिये अभी कोई प्रावधान नहीं है । दुकानदार ग्राहक से यह राशि वसूल करके स्वयं रख लेता है जो ब्लैकमनी के रूप में समानान्तर अर्थव्यवस्था का हिस्सा वन जाती है । 
वोटर कार्ड की तरह प्रत्येक मतदाता का PAN कार्ड वनवाया जाय ।
     इसके लिये हर छोटे वड़े दुकानदार /व्यापारी के लिये सारा लेनदेन पीओएस मशीन के माध्यम से करना तथा ग्राहक के लिये जनधन योजना के तहत बैंक खाता तथा डेविट कार्ड से ही ख़रीद दारी करना अनिवार्य किया जाना चाहिये । जिसमें हर ख़रीद के लिये PAN नम्बर दर्ज करना अनिवार्य हो । 
  साथ ही POS मशीन में यह व्यवस्था भी हो कि किये गये लेन देन का व्योरा सीधे इनटैक्स आफिस के कम्प्यूटर में व्यक्ति के खाते में एन्ट्री हो सके । 

इनकम टैक्स के अलग अलग स्लैव व उन्हें कम ज़्यादा करके जनता को वेवकूफ वनाने का खेल बंद किया जाय । इसके स्थान पर प्रत्येक परिवार को एक गाइड लाइन के तहत परिवार के  जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति व भविष्य के लिये रोटी कपड़ा व मकान की आवश्यकता के आधार पर एक मानक स्तर वना कर उसमें कम ज़्यादा करने का अधिकार कर दाता स्वयं को दिया जाकर उसकी शेष आमदनी में से मात्र 10%राशि राष्ट्र को समर्पित करने का नियम बनाया जाय । 
 यातायात विभाग द्वारा रोड विकास के नाम पर टोल टैक्स व ट्रैफ़िक पुलिस द्वारा यातायात को प्रभावित नहीं करने वाले कारकों  पर अवैध वसूली बन्द कर  इसके स्थान पर वाहन ख़रीदते वक़्त एक मुश्त रक़म बसूल करना वेहतर विकल्प हो सकता है 
    Vikram singh bhadoriya 
Vill&panchayat Kyaripura p.o.surpura Distt Bhind ( M.p.) 28-4-2017 

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

वंदे अँम्बे

आज से तीन वर्ष पूर्व लिखी गईँ माँ रणचण्डी कालरात्रि के समक्ष की गई अभिलाषा को हमारे रणवांकुरों ने पाकिस्तान के आतंकी सुअर बाड़े में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक करके अक्षरश: सत्य कर दिया है । 
उन्हीं वीरों  के सम्मान में पुन: शेयर कर रहा हू

बंन्दे अंम्बे !  े
न बर दे मुझे न अमर कर दे 

मैं हूँ कपूत तेरा,  रख सका न लाज तेरी 
मार कर लात एक
ठेल कर नरक द्वार 
अन्दर कर  दे 
नर पिशाच भेड़ियों के बीच 
कर सकूँ वध उनका 
बस !  एक खंङ हस्त कर दे । 

बंन्दे अम्बे !  
न वर दे मुझे न अभय दे 
छोड़ दे तू वरद हस्त, बस!
मुष्टि में शत्रु का सर दे  !  
पहिन ले तू फिर से मुंण्डमाल 
लपलपाती जिह्व ज्वाल 
कर संहार पंच मार्ग 
जय चंद ओ मीर जार,
गोरी औ ग़ज़नवी 
सब एक बार,  एक घाट ।

बंन्दे अम्बे !
न वरदे मुझे न  अमर कर दे  ,

उग आये हैं रक्त बीज 
नर पिशाच ओ नराधम 
न तू मुझे शक्ति दे न भक्ति दे 
बस!  भर दे कराल ज्वाल 
उर में,  
अंतहीन,  शत्रु रक्त प्यास दे,  

बंन्दे अंम्बे !  
न बरदे मुझे न अभय दे   .... 

....।  Vikram Singh Bhadoriya