इक चाँद का अक्स है मेरे दिल के आइने पर ।
इक तूफ़ाँ है जुनून बन कर हलचल मचाये हुये ।। - -...................... - विक्रम सिंहँ भदैरिया
इक चाँद का अक्स है मेरे दिल के आइने पर ।
इक तूफ़ाँ है जुनून बन कर हलचल मचाये हुये ।। - -...................... - विक्रम सिंहँ भदैरिया
management को कभी नहीं पता होता कि कौन employee काम कर रहा है ... काम न करने वाले गधे को इनामऔर काम करने बाले घोड़े को सज़ा और यह सिलसिला जारी रहता है कोल्हू के बैल के रिटायरमेंट तक .... ! एक अच्छा आॅफिसर अनिवार्य रूप से एक अच्छा मेनेजर भी होना ही चाहिये लेकिन उपरोक्त कमज़ोरी जो कि मूलत: उसके अधीनस्थ चमचा टाइप व चुगलखोरों की गैलेक्सी की बजह से होती है और उसकी टीम की कार्य शक्ति को बुरी तरह प्रभावित करती है । @vinod k Tripathi ji
Vikram singh bhadoriya TI
Ghatigaon 28-1-15 o
Lakkad baggghey
लकड़बघ्घे । (एक अकविता वस यूँही)
खुदा के वेश में
जन्मते शैतान
रक्त बीज
जहरीले बरषाती कीड़े
या लकडबघ्घे
जीवित माँ भारती का
मांस नौच नौच कर खाते
अल्लाहो अकबर गाते
नरपिशाच
क्या खुदा वाकई मर गया है?
इन शैतानों को जन्म देने के बाद
या फिर
डर कर छुप गया है
किसी खोह मैं
इन रक्त पिपासु लकड़बघ्घों के डर से
थरथर कांपता
सर के बाल नौचता हुआ खुदा .....
किस मनहूस घडडी में
उसने रच दिया
इन मानवता के रक्त के प्यासे भेड़ियों को
जो कर रहे हैं लहू लुहान
मासूम बच्चों के खून से
लाचार औरतों की आबरू
तार तार
स्वर्ग में
नब्बे हूरों और
बहत्तर लौंडों के साथ अप्राकृतिक वासना की चाह में
मार डाला खुदा को
बेबजह बे कसूर
हिजड़ों के वेश में
बैठे हुये शासनाध्यक्ष
कापुरुष
कायर
पुरुषो अधम
राज कर रहा
प्रजातंत्र के गधा तंत्र पर
निरंकुश नौकर तंन्त्र
अपने ही देश में
वेगाने हुये
निराश्रित शरणार्थी
लुटी पिटी औरतें
धरती के स्वर्ग पर
काबिज हैं लकड़बघ्घे
रक्त पिपासु, नराधम
और हिजड़ा प्रजातन्त्र
और स्यूडो सैक्युलेरिज्म
प्रजा की पीठ पर सवार
बेईमान नौकर तन्त्र
आशा की कोई किरन नहीं दूर तक
बस निविड़ अंधकार
निराशा का चीत्कार
हाहा कार
शरणार्थी शिविरों में
सिमटी दुबकी जिन्दगियां
अपने ही घर में घुसे
अट्टहास करते
क्रूर लकडडबघ्घों को ताकती
लाचार निगाहें
धरती का स्वर्ग
आज
धरती का नर्क है
जहां नाचते हैं
खुदा के वेश में
शैतान नंगे होकर । । 6-04— 2013 ग्वालियर ।
....................
हमारे आने पर
उनके अपनों का रूठ जाने का डर था ।
न आने पर सितम ओ बेवफ़ाई की तोहमत
होठ सी लेने दे मुझे
वंद पलकों के मानिंन्द
न तुझे पलकें झुकाने की जरूरत
न मेरे कुछ कहने का डर होगा ।
........
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.....Vikram Singh Bhadoriya
7 oct.2013 Ghatigaon
Photo curtsy .. Dr Neetu sikarwar
वो इक शख्श जिसने चाहा मुझे
खाक होजाने के बाद भी ,
याद आता है वो आज मुझे
होश खो देने के बाद भी ।
किस कदर तरसी होगी वो रूह
जिस्म में होने के बाद भी ।
कि अक्स बाकी है , खुमार बाकी है
उसके फना होजाने के बाद भी ।
इक दर्द का सैलाव था
इक आंसुओं का दरिया था
उसके अपने सीने में ,
मैं ही रहा बेखबर
सारी उम्र बीत जाने के बाद भी ।
विक्रम सिंह भदौरिया़़़ ़़
२२-१२-२०१३ घाटी गाँव