गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

...इक चाँद .....

इक चाँद का अक्स है मेरे दिल के आइने पर ।     

इक तूफ़ाँ है जुनून बन कर हलचल मचाये हुये ।।       -                                       -...................... - विक्रम  सिंहँ भदैरिया 

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

" सात जन्मों के बाद " Kamlesh Chauhan "Gauri " का नया उपन्यास

कमलेश चौहान "गौरी " का यह उपन्यास सात जन्मों के विशाल कैनवास पर उकेरी गई एक आदर्श प्रेम गाथा है  जहाँ दो प्रेमी ह्रदयों की मानव सुलभ    कोमल भावनाओं की कश्ती , बाल ,युवा व  ज़रा अवस्थाओं  से , जन्म- मृत्यु , देश -काल व देह की सीमाओं से वेखबर समय के उदधि में   , कवियत्री व उपन्यासकारा कमलेश चौहान के भावुक गीतों की स्वर लहरियों पर थिरकती कभी , मिलन व विछोह की  धूप -छाँव तले डोलती  मचलती सी कभी ,  सात जन्मों के विस्तीर्ण रंगमंच पर मंचित एक  नृत्य नाटिका सदृश्य  रचना है  जिसमें लेखिका मानव ह्दय के प्रेम के साथ साथ  सृष्टि व समिष्ठि के , भौतिक व पराभौतिकी के , कल्पना व यथार्थ के मिलन की अद्भुत प्रस्तुति करने में पूर्णत: सफल रहीं हैं,  और साथ ही  वह  अपने पूर्व उपन्यासों "सात समुन्द्र पार " तथा  "सात फेरों से धोखा " की तरह ही इस उपन्यास में भी वह अपनी स्त्री ह्र्दय की कुशल चित्रकार की छवि को प्रतिस्थापित करने में  पूर्णत:  सफल रहीं हैं ँ। मैं उनके पूर्व उपन्यासों , कविताओं तथा  पटकथाओं की भाँति इस उपन्यास की  भी काल जयी रचनाओं में शुमार होने की ,और सफलता की ,  कामना करता हूँ । 
                            Vikram singh bhadoriya   
                             Ghatigaon GWALIOR 
                     
              7-2-2015 

शनिवार, 31 जनवरी 2015

Vikramaark.blogspot: कविता

Vikramaark.blogspot: कविता: कविता दिल की रूकी हुई झील के तटबंध तोड़कर वह निकली नदी है ... कविता समय की दुकूल पर हवा की उँगलियों के कोमल स्पर्श की सिहरन है ...  कविता ...

कोल्हू का बैल ....

management को कभी नहीं पता होता कि कौन employee काम कर रहा है ... काम न करने वाले  गधे को इनामऔर काम करने बाले घोड़े को सज़ा  और यह सिलसिला जारी रहता है  कोल्हू के बैल के रिटायरमेंट तक .... !  एक अच्छा आॅफिसर अनिवार्य रूप से एक अच्छा मेनेजर  भी होना ही चाहिये   लेकिन उपरोक्त कमज़ोरी  जो कि मूलत: उसके अधीनस्थ चमचा टाइप व चुगलखोरों की गैलेक्सी की बजह से होती है और उसकी टीम की कार्य शक्ति को बुरी तरह प्रभावित  करती है ।  @vinod k Tripathi ji


Vikram singh bhadoriya TI 

Ghatigaon  28-1-15 o

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

लकड़बघ्घे

Lakkad baggghey 

लकड़बघ्घे   ।      (एक अकविता वस यूँही) 


खुदा के वेश में 

जन्मते शैतान 

रक्त बीज 

जहरीले बरषाती कीड़े 

या लकडबघ्घे 

जीवित माँ भारती का 

मांस नौच नौच कर खाते 

अल्लाहो अकबर गाते 

नरपिशाच 


क्या खुदा वाकई मर गया है?

इन शैतानों को जन्म देने के बाद 

या फिर 

डर कर छुप गया है 

किसी खोह मैं 

इन रक्त पिपासु लकड़बघ्घों के डर से 

थरथर कांपता 

सर के बाल नौचता हुआ खुदा .....

किस मनहूस घडडी में

उसने रच दिया 

इन मानवता के रक्त के प्यासे भेड़ियों को 

जो कर रहे हैं लहू लुहान 

मासूम बच्चों के खून से 

लाचार औरतों की आबरू 

तार तार 


स्वर्ग  में 

नब्बे हूरों और 

बहत्तर लौंडों के साथ अप्राकृतिक वासना की चाह में

मार डाला खुदा को 

बेबजह बे कसूर 


हिजड़ों के वेश में 

बैठे हुये शासनाध्यक्ष 

कापुरुष 

कायर 

पुरुषो अधम 

राज कर रहा

प्रजातंत्र के गधा तंत्र   पर 

निरंकुश  नौकर तंन्त्र 


अपने ही देश में 

वेगाने हुये 

निराश्रित शरणार्थी 

लुटी पिटी औरतें 

धरती के स्वर्ग पर 

काबिज हैं लकड़बघ्घे 

रक्त पिपासु, नराधम 

और हिजड़ा प्रजातन्त्र

 और स्यूडो सैक्युलेरिज्म 

प्रजा की पीठ पर सवार 

बेईमान  नौकर तन्त्र 


आशा की कोई किरन नहीं दूर तक

बस निविड़ अंधकार  

निराशा का चीत्कार

 हाहा कार 

शरणार्थी शिविरों में 

सिमटी दुबकी जिन्दगियां 

अपने ही घर में घुसे 

अट्टहास करते 

क्रूर लकडडबघ्घों को ताकती 

लाचार निगाहें 


धरती का स्वर्ग 

आज 

धरती का नर्क है 

जहां नाचते हैं

खुदा के वेश में 

शैतान नंगे होकर   । ।      6-04— 2013 ग्वालियर । 

....................

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

हमारे आने पर ...

हमारे आने पर 

उनके अपनों का रूठ जाने का डर था  ।

न आने पर सितम ओ बेवफ़ाई की तोहमत 


होठ सी लेने दे मुझे 

वंद पलकों के मानिंन्द 

न तुझे पलकें झुकाने की जरूरत 

न मेरे कुछ कहने का डर होगा  । 

........

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.....Vikram Singh Bhadoriya

7 oct.2013 Ghatigaon

Photo curtsy .. Dr Neetu sikarwar 

रविवार, 30 नवंबर 2014

वो इक शख़्स

वो इक शख्श जिसने चाहा मुझे 

   खाक होजाने के बाद भी  ,

याद आता है वो आज मुझे 

होश  खो देने के बाद भी  । 


किस कदर तरसी होगी वो रूह  

जिस्म में होने के बाद भी । 

कि अक्स बाकी है , खुमार बाकी है 

उसके   फना   होजाने के बाद   भी । 


इक दर्द का सैलाव था 

इक आंसुओं का दरिया था 

उसके अपने सीने में , 

मैं ही रहा बेखबर  

सारी उम्र बीत जाने के बाद भी । 


विक्रम सिंह भदौरिया़़़ ़़ 

२२-१२-२०१३ घाटी गाँव