वो इक शख्श जिसने चाहा मुझे
खाक होजाने के बाद भी ,
याद आता है वो आज मुझे
होश खो देने के बाद भी ।
किस कदर तरसी होगी वो रूह
जिस्म में होने के बाद भी ।
कि अक्स बाकी है , खुमार बाकी है
उसके फना होजाने के बाद भी ।
इक दर्द का सैलाव था
इक आंसुओं का दरिया था
उसके अपने सीने में ,
मैं ही रहा बेखबर
सारी उम्र बीत जाने के बाद भी ।
विक्रम सिंह भदौरिया़़़ ़़
२२-१२-२०१३ घाटी गाँव

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