रविवार, 30 नवंबर 2014

वो इक शख़्स

वो इक शख्श जिसने चाहा मुझे 

   खाक होजाने के बाद भी  ,

याद आता है वो आज मुझे 

होश  खो देने के बाद भी  । 


किस कदर तरसी होगी वो रूह  

जिस्म में होने के बाद भी । 

कि अक्स बाकी है , खुमार बाकी है 

उसके   फना   होजाने के बाद   भी । 


इक दर्द का सैलाव था 

इक आंसुओं का दरिया था 

उसके अपने सीने में , 

मैं ही रहा बेखबर  

सारी उम्र बीत जाने के बाद भी । 


विक्रम सिंह भदौरिया़़़ ़़ 

२२-१२-२०१३ घाटी गाँव 


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