क्यों
छू देती हो
भावनाओं की कोंपलों को .
तुम
अपने अहसास की उँगलियों से ..
कि उन्हें
तुम्हारी उँगलियाँ ...
उनकी अपनी उँगलियों जैसी लगतीं है ..
दीवाना बना देती हो जमाने को ....
अपनी तवारीख को
उनकी दीवालों पर लिख कर
खुद तो दीवानी हो पर ...
दोष देती हो जमाने को...........!
(अपना दीवाना वना कर ).... :!
विक्रम सिंह भदौरिया
३०-८-२०१७ (re posted & published at my blog )
Photo curtsy - Dr Neetu Sikarwsr

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