बुधवार, 12 नवंबर 2014

कविता

कविता दिल की रूकी हुई झील के तटबंध तोड़कर वह निकली नदी है ...

कविता समय की दुकूल पर हवा की उँगलियों के कोमल स्पर्श की सिहरन है ... 

कविता  किसी की निश्छल हँसी की मधुरम् खन ख़म है ...

कविता दिल के तार सप्तक को झंकृत करती   उसकी यादों के निर्झर की कल कल है 

Vikram singh bhadoriya 

10-08-14 

Photo curtsy @Dr Neetu singh sikarwar 


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