कविता दिल की रूकी हुई झील के तटबंध तोड़कर वह निकली नदी है ...
कविता समय की दुकूल पर हवा की उँगलियों के कोमल स्पर्श की सिहरन है ...
कविता किसी की निश्छल हँसी की मधुरम् खन ख़म है ...
कविता दिल के तार सप्तक को झंकृत करती उसकी यादों के निर्झर की कल कल है
Vikram singh bhadoriya
10-08-14
Photo curtsy @Dr Neetu singh sikarwar

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