मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

हिन्दी के विकास के लिये

प्रिय हितेश शर्मा जी आपकी चिंता बाजिब है लेकिन तमिलनाडु में  हिन्दू संस्कृति आज भी जीवित है और वह हम उत्तर भारतियों की तुलना में कहीं श्रेष्ठ हिन्दू है । जहाँ हम माथे पर तिलक लगाने व धोती पहनने में संकोच करते है , वहीं  तमिलनाडु में सूट बूट पहनने  बाले ब्यक्ति भी माथे पर रोली चन्दन का विन्दी तिलक या त्रिपुंड और गले में तुलसी की माला ज़रूर पहनते हैं और ऐसा करने में गर्व का अनुभव करते है । 
 दक्षिण के मूर्ख नेताओं ने नहीं दुष्ट नेताओं ने हिन्दू विरोध व ब्राह्मण विरोध को अपना हथियार अपनी घृणित व विघटन कारी राजनीति चमकाने के लिये बनाया  , साथ ही हिन्दू धर्म व संस्कृति  के विरोध के लिये यह ज़रूरी था कि संस्कृत और हिन्दी का विरोध किया जाय । क्योंकि हिन्दी व संस्कृत पढ़ा हुआ  ब्यक्ति मौक़ा मिलने पर ,हिन्दू धर्म  व  साहित्य पढ़ लिये जाने पर इन नेताओं की असलियत जान लेने का पूरा ख़तरा मौजूद था । इसलिये जानबूझ कर  ब्राह्मण , संस्कृत व हिन्दी बोलने वाले हर हिन्दू को अपमानित किया गया । 
 हमारे केन्द्र के आज़ादी बाद के नेता भी ईमानदार नहीं थे । इन्होंने प्रांतों का बँटवारा भी फूट डालो राज करो की नीति पर ही भाषा के आधार पर प्रांतों का सीमांकन किया था । ताकि  भारत गण राज्य में कभी भी एक संम्पर्क भाषा के तैर पर हिन्दी को प्रतिष्ठापित न किया जा सके । इसके साथ ही  हिन्दी दिवस व विश्व हिन्दी दिवस जैसे आयोजन करके ग़ैर हिन्दी भाषी जनता के मन में उनकी अपनी मातृभाषा के विलुप्त हो जाने का डर एक सोची समझी नीति  व राष्ट्र विरोधी षणयंन्त्र के तहत विठाल दिया गया था । जिसमें हिन्दी व ग़ैर हिन्दी भाषी दोनों प्रकार के नेता शामिल थे । 
  हिन्दी का विकास अँग्रेजी केविकास की राह पकड़ कर व अँग्रेजी के विनाश के साथ ही सम्भव है । यह कार्य Narendra Modi और स्मृति ईरानी चाहें तो मात्र चार साल वचे हैं उनके पास , उनके कार्यकाल में कर सकते है और वो भी विना कोई हिन्दी सम्मेलन का प्रेपेगंडा किये बग़ैर । इसके लिये मेरे निम्न सुझाव हैं । 
१. हिन्दी भाषा का नाम लिये बग़ैर सारे भारत में आयोजित होने वाली प्रांन्तीय व केन्द्रीय नौकरी के लिये  प्रतियोगी परीक्षाओं में  उत्तर लिखने का माध्यम सिर्फ संविधान की आठवीं अनुसूची मैं दर्ज १५भाषाओं में से किसी एक भाषा ही लिखा जाना अनिवार्य कर दिया जाये । 
      २.किसी भी प्रादेशिक नौकरी की परीक्षा में अँग्रेजी का पेपर नहीं रखा जाय वल्कि उसकी जगह पर   उस प्रदेश की मातृभाषां का सामन्य व सरल   ज्ञान का पेपर के साथ अँग्रेजी के स्थान पर प्रादेशिक मात्र भाषा से इतर संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज भाषाओं में से एक भाषा का सरल पेपर । का  अनिवार्य  कर दिया जाय । 
    ३. सभी upsc व केन्द्र शासित प्रदेशों  की नौकरी के लिये आठवीं अनुसूची की १५ भाषाओं में से एक भाषा का एक अनिवार्य  पेपर तथा  दूसरी भाषा के वतौर एक पेपर सरल हिन्दी भाषा का अनिवार्यत: रखा जाय । 
  स्कूलों व कालेज में उनकी मान्यता वनाये रखने के लिये हर संस्था में   सभी संविधान सम्मत  भारतीय भाषाओं के टीचर रखा जाना अनिवार्य किये जाने के साथ ही प्रायमरी से लेकर पोस्ट ग्रेजुएट क्लास (तक चाहे वह किसी भी विषय की क्लास हो) अपनी मातृ भाषाके साथ एक भारतीय भाषा की पढ़ाई अनिवार्य करने के साथ ही यह व्यवस्था भी की जाय कि भाषा की परीक्षा में फ़ेल होने पर श्रेणी पर कोई प्रभाव नहीं पड़े लेकिन अधिक नम्बर आने पर परीक्षा परिणाम में श्रेणी सुधार के लिये भाषा के अतिरिक्त मार्क्स जोड़े जा सकें । 

 संविधान व क़ानूनों की किताबों में किसी अर्थ मैं विवाद की स्थिति में वर्तमान में    जो अभी अँग्रेजी वर्जन को शुद्ध व अंतिम सत्य माना जाता है । यह परिपाटी ख़त्म करके इसके बजाय हिन्दी वर्जन को ही प्रामाणिक माना जाय इस हेतु तथा 
 सभी प्रादेशिक न्यायालय व उच्च न्यायालयों की भाषा अनिवार्य रूप से उसी  प्रदेश की ही भाषा हो जहाँ वह न्यायालय स्थित है,  तथा सर्वोच्च न्यायालय की भाषा अनिवार्यत: हिन्दी ही हो । इस हेतु सर्वोच्च न्यायालय से चर्चा करके लोक सभा में प्रस्ताव पारित करके या न्यायालय से आदेश जारी करवा कर व्यवस्था की जाय । 
  उपरोक्त तरकीब से हम सिर्फ पाँच साल मैं न सिर्फ हिन्दी का वल्कि देश की सभी संवैधानिक भाषाओं का समग्र विकास करते हुये हिन्दी को केन्द्रीय भाषा व राष्ट्रीय  एकता की वाहक भाषा के रुप में स्थापित करने में सक्षम  हो सकते है ।
Vikram singh bhadoriya 
२८-११-२०१५ 
रामेश्वरम् तमिलनाडु , स्वयं की Fb post पर@हितेश शर्मा के कमेंट के उत्तर पर लिखी गई 

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

ख़यालों की झील के उस पार

ख़यालों की झील के उस पार 

यादों की झिलमिल में 

पसरा हुआ  नि:शब्द कुहासा 

उदास है , 

तुम्हारी ही तरह 

कभी चमक उठता है 

विस्तीर्ण काल मेघों की ओढ़नी की कोर पर 

टाँकी गई श्वेत धवल चाँदनी सी 

तुम्हारी ही याद की तरह ... 

........vikram singh bhadoriya ......

           21-dec -2015 Gwalior 

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

चोर और गाय माँस भक्षण के समर्थन में साहित्यकारों व वैज्ञानिकों का हाहाकार

पुष्प पद्म भूषण और ज्ञान पीठ पुरुस्कार लौटाने वालों का काला सच 

 सीरीज़ -१ 

  ये है महान वैज्ञानिक पद्म विभीषण  पुष्प मित्र भार्गव (@pushp mitra Bhargav ) इन्होंने 1984 में 2800 सिखों के नरसंहार और इसके भी पहले पंजाब में आतंकियों द्वारा कलबुर्गी की तरह चुन चुन कर मारे गये बिचारकों व बुद्धिजीवियों की हत्याआों  से प्रसन्न होकर सन् 1985 मैं इन हत्याओं के लिये ज़िम्मेवार कांग्रेस की ख़ूनी सरकार के हाथों  पद्म भूषण पुरुस्कार ग्रहण किया था ।  

       फिर जब 19  जनवरी  1990 की रात जब कश्मीर में हिन्दू कश्मीरी पण्डितों का भीषण नरसंहार किया  गया था , तब इनकी आत्मा गूँगी और बहरी होकर मरी पड़ी थी । 

         27फरवरी 2002 को जब 59 हिन्दू गोधरा में ट्रेन में ज़िंदा जला दिये गये थे तथा इसके बाद हुये दंगों में तमाम हिन्दू व मुसलमान तवाह हो गये थे  तब भी इनकी आत्मा पुरुस्कार पर पुरुस्कार पाकर पिशाच की तरह नृत्य कर रही थी । 

जो फिर  20 अगस्त 2013 को नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या के बाद तीन साल तक शायद कान में तेल डाल कर सोती  रही थी । 

          जो February 20,2015 को श्री गोविंद पनसारे की हत्या के नौ माह बाद तक और 

         30 अगस्त  2015 को  प्रोफ़ेसर श्री एम एम कलबुर्गी  की नृशंश हत्या के एक माह बाद तक भी  नहीं जागी । 

         पर 30 september 2015  को एक चोर और गाय की हत्या कर माँस खाने बाले की पिटाईँ पर इनकी छाती फट गई आत्मा हाहाकार कर उठी और इन्होंने अपना कांग्रेस सरकार का दिया हुआ पद्मभूषण का तमग़ा भाजपा की मोदी सरकार को लौटा दिया  है । 

 क्योंकि उपरोक्त नरसंहारों में मारे गये लोग सिख हिन्दू और मुसलमान थे जो इनकी दृष्टि में गाय की तरह सिर्फ़ जानवर थे और गाय चोरी करके व काटकर खाने वाला एक मात्र इंसान था । सो बहुत सारे महान व गाय के माँस से तृप्त होने वाले  साहित्यकारों की पिशाच आत्मायें यकायक रुदन कर उठीं और पुरुस्कार बापसी की होड़ मची हुयी है । 

 मैं अपने #facebook  व #G+ के  मित्रों से अनुरोध करता हूँ कि वह इन नराधम साहित्यकारों के काले इतिहास को खोज कर बेनक़ाब करें । 

। पुष्प मित्र भार्गव वैज्ञानिक 


बुधवार, 9 सितंबर 2015

सुहानी सुबह का सूरज

ये सुहानी सुबह,  
 शर्माया हुआ सा  सूरज
ज्यूँ   
सुरमई आँखों से 
मुस्कुराये 
कोई रुपहली सी शबनम । 

Vikram singh bhadoriya 
Morning 6.10 am 
En route to Ujjain At pachor station 

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

करीम पठान अनमोल (KP Anmol ) की FB POST पर

बीज वनने की चाह में , 

अहर्निश 

ज़मीन वन कर 

यह

अविचल ... 

प्रस्तर ,

यह ज़मीर तुम्हारा 

आख़िर 

फूट पड़ता है 

 ....

सरस , सतत,सलिल प्रेम निर्झर  

.बन ..!

बह निकलते हो  तुम 

सदा 

"अनमोल "अकूत अथाह 

जलराशि उदधि तुम .... !!!


Vikram singh bhadoriya 

Bhind  2-9-2015  wed . 4.10am


मंगलवार, 4 अगस्त 2015

विचारों के उत्तुंग शिखर पर

DIL NE KABHI SOCHA THA,

Man vicharon ke utung shikhar par ek

Akela virchh hota 

Sirsti ke suprabhat ki 

Usha ki pahali kiran 

Mere nav viksit taru pallawon se ath kheliyan karti ,

Par tabhi tuti tandraa 

Uttar main MAYA ka kroor attahaas se

KENDR main Bhristachaari NANGON ke naach se 

Purav main MAMATA KE niraday cheetkar se

Nyay ke liye hahakar karate ,

Hajaron ANNA HAZAARF

Sach bole kar LANGOTI bacha kar bhagate baba  Ram Dev. 


दिल ने कभी सोचा था .. 

मैं विचारों के उत्तुंग शिखर पर ,

एक अकेला वृक्ष होता । 

सृष्टि के सुप्रभात की  ,उषा की पहली किरन...

मेरे नव विकसित तरु पल्लवों से अठखेलियाँ करती 

पर तभी , टूटी तंन्द्रा 

उत्तर में माया के क्रूर अट्टहास से 

केन्द्र में भ्रष्टाचारी नंगों  के नाच से 

पूर्व में ममता के निर्दय चीत्कार से 

न्याय के लिये हाहाकार करते... 

हज़ारों अन्ना हज़ारे  और ,

सच वोल कर लँगोटी वचाने की जुगत में 

मैदान छोड़कर भागते बाबा रामदेव । 


विक्रम सिंह भदौरिया 

५अगस्त २०१५ 

सोमवार, 27 जुलाई 2015

महा महिम अबुल पकीर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम के महा प्रयाण पर

महा महिम अबुल पकीर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम के महाप्रयाण पर ... 

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ऊँ द्यौ: शांति: अंतरिक्षं शांति:पृथ्वी: शांति: अग्नि पथया: शांति: .... । 


नि:शब्द है अग्निपथ ,

ज्योति हुई शांत है ।

पृथ्वी शांत है , 

आकाश हुआ शांत है ।।

चला गया दूर कहीं , 

प्रणेता अबुल पकीर ।

अग्नि के पँख लिये ,

अनन्त की उड़ान पर

 अनाथ कर राष्ट्र को ।।


श्रद्धा नु अश्रुपूरित नमन 

विक्रम सिंह भदौरिया । ग्वालियर 27-7-2015 सोम. 

रविवार, 28 जून 2015

शिक्षा में ठेकेदारी प्रथा की हिमायत और भगवा करण का विरोध ।

शिक्षा में ठेकेदारी प्रथा और शिक्षा 

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  के भगवा करण  का हौआ । 

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 आज देश में शिक्षा  में ठेकेदारी प्रथा के समर्थक ही हैं जो शिक्षा पद्यति में सुधार के किसी भी प्रयास का विरोध करने के लिये शिक्षा का भगवा करण का हौआ खड़ा करते है 



 हालात यह हैं कि प्रार्थमिक शिक्षा का पूर्ण रूपेण ठेकेदारी करण शासन ने कर दिया है और   उच्च शिक्षा को निजी शिक्षा उद्योग के हवाले करने के साथ साथ इस बात के पुख़्ता प्रवंध किये गये है कि प्रतिभावान लेकिन निर्धन विद्यार्थी किसी भी प्रकार से उच्च शिक्षा प्राप्त न कर सकें और अयोग्य लेकिन डफ़र विद्या की अर्थी आरक्षण या पैसे के बल पर  डिग्री प्राप्त  मूर्खों को शासन में उच्च पदों पर विराजमान करके राष्ट्र का ब्रेन ड्रेन करके उसे विकास पथ पर से पीछे ढकेला जा सके । 

    शिक्षा के ठेकेदारों यानि (संविदा शिक्षकों )की भर्ती के लिये   वाकायदा निविदायें आमन्त्रित की जाती है । और नक़ल से  थर्ड क्लास हायर सेकेण्डरी  पास पैसे के वल पर शिक्षा का बँटाढार करने यानि पढ़ाने का ठेका पा जाते हैं । 

दूसरी तरफ़  कला व समाजशास्त्र साहित्य व इतिहास की शिक्षा ठप्प हो चुकी है और उच्च तकनीकी शिक्षा का पूर्ण औद्योगिकीकरण सरकार ने  करके इसे भी शिक्षा माफ़िया के हवाले  कर दिया है । 

  नई शिक्षा नीति के तहत MBBS के आगे उच्च शिक्षा की अभिलाषा रखने वाले विद्यार्थी को PPG    के वहाने रोका जाता है वहीं अयोग्य विद्या की अर्थियों को सिर्फ जातिगत आरक्षण के सहारे भविष्य में  देश का कर्ण धार बनाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया जाता है । अगर कोई मेधावी क्षात्र इन वाधाओं को पार करके आगे बढ़ कर शोध करने के लिये research करने की सोचे तो उसे फिर से  पी एच डी एन्ट्र्ेंस टैस्ट देना पड़ता है ।  क्योकि हमारी सरकार इस बात का पूख्ता इंतज़ाम कर देना चाहती है कि कोई मेधावी क्षात्र किसी भी तरह से राष्ट्र का ब्रेन वन कर उनके लिये ख़तरा न  वन पाये ।  

           इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिये शिक्षा विभाग के नियम भी वनाये गये हैं कि  ,यदि कोई मेधावी छात्र  एक से अधिक विषय ों में एक साथ M A  या MSc या M PHIL करना चाहे तो , उसे इजाज़त नहीं हैं यह सरकारी नियम है ।    

  देश के कानून का ज्ञान होना हर व्यक्ति के लिये अनिवार्य माना जाता है  पर , इसके एक दम उलट  सरका यह पुख़्ता व्यवस्था करने जा रही है कि कानून कोई आसानी से न पढ़ सके इसके लिये  LLB करने के लिये भी पहले pre LLB टेस्ट को अनिवार्य किया जा रहा है और म.प्र. में तो आप 45 वर्ष की उम्र के वाद  न तो LLB  कर सकते हैं और न ही    कोर्ट में प्रेक्टिश करने के लिये सनद ही पा सकते हैं ।  हाँ अगर आप SC/ST/OBC या कुछ मालदार  सवर्ण हैं तो आपके लिये शिक्षा का हर रास्ता खुला है ।  जय हो ! मैं brain drain के इस राष्ट्र व्यापी षणयंन्त्र के  शीघ्र सफलता की कामना करता हूँ ।  

विक्रम सिंह भदौरिया 

ग्वालियर 

२९-६-२०१५ 



गुरुवार, 25 जून 2015

मेरे जीवन में तुम ...

P
मेरी कविता में तुम 

मेरी कविता में तुम ... 

सीप में ,

समाई में ,

समाई हुई मोती सी , 

रात को चाँद ने 

जब 

विखेरा तुम्हें ,

क़तरा कतरा शवनम सा 

चाँदनी की चादर पर ...

समेटता रहा 

में ..

तुम्हें ..

जीवन भर 

फिर फिर , सात जन्म तक । 

पर,

हाथ कब आती हो तुम 

फिसल फिसल जाती हो तुम 

हर वार इक नईँ हार 

स्वीकार ...!

न तुम करती हो न मैं 

....और यह जीवन 

 और वह मंृत्यु 

चक्र है ...वस !

चलता रहता है  

यूँ ही....!

विना रुके , विना थके 

अहर्निश ।। 


             विक्रम सिंह भदौरिया 

                 ग्वालियर २४-६-२०१५

नीलू नीलम की कविता (हाँ पढ़ी तुम्हारी कविता ) से प्रेरित 

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

...इक चाँद .....

इक चाँद का अक्स है मेरे दिल के आइने पर ।     

इक तूफ़ाँ है जुनून बन कर हलचल मचाये हुये ।।       -                                       -...................... - विक्रम  सिंहँ भदैरिया 

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

" सात जन्मों के बाद " Kamlesh Chauhan "Gauri " का नया उपन्यास

कमलेश चौहान "गौरी " का यह उपन्यास सात जन्मों के विशाल कैनवास पर उकेरी गई एक आदर्श प्रेम गाथा है  जहाँ दो प्रेमी ह्रदयों की मानव सुलभ    कोमल भावनाओं की कश्ती , बाल ,युवा व  ज़रा अवस्थाओं  से , जन्म- मृत्यु , देश -काल व देह की सीमाओं से वेखबर समय के उदधि में   , कवियत्री व उपन्यासकारा कमलेश चौहान के भावुक गीतों की स्वर लहरियों पर थिरकती कभी , मिलन व विछोह की  धूप -छाँव तले डोलती  मचलती सी कभी ,  सात जन्मों के विस्तीर्ण रंगमंच पर मंचित एक  नृत्य नाटिका सदृश्य  रचना है  जिसमें लेखिका मानव ह्दय के प्रेम के साथ साथ  सृष्टि व समिष्ठि के , भौतिक व पराभौतिकी के , कल्पना व यथार्थ के मिलन की अद्भुत प्रस्तुति करने में पूर्णत: सफल रहीं हैं,  और साथ ही  वह  अपने पूर्व उपन्यासों "सात समुन्द्र पार " तथा  "सात फेरों से धोखा " की तरह ही इस उपन्यास में भी वह अपनी स्त्री ह्र्दय की कुशल चित्रकार की छवि को प्रतिस्थापित करने में  पूर्णत:  सफल रहीं हैं ँ। मैं उनके पूर्व उपन्यासों , कविताओं तथा  पटकथाओं की भाँति इस उपन्यास की  भी काल जयी रचनाओं में शुमार होने की ,और सफलता की ,  कामना करता हूँ । 
                            Vikram singh bhadoriya   
                             Ghatigaon GWALIOR 
                     
              7-2-2015 

शनिवार, 31 जनवरी 2015

Vikramaark.blogspot: कविता

Vikramaark.blogspot: कविता: कविता दिल की रूकी हुई झील के तटबंध तोड़कर वह निकली नदी है ... कविता समय की दुकूल पर हवा की उँगलियों के कोमल स्पर्श की सिहरन है ...  कविता ...

कोल्हू का बैल ....

management को कभी नहीं पता होता कि कौन employee काम कर रहा है ... काम न करने वाले  गधे को इनामऔर काम करने बाले घोड़े को सज़ा  और यह सिलसिला जारी रहता है  कोल्हू के बैल के रिटायरमेंट तक .... !  एक अच्छा आॅफिसर अनिवार्य रूप से एक अच्छा मेनेजर  भी होना ही चाहिये   लेकिन उपरोक्त कमज़ोरी  जो कि मूलत: उसके अधीनस्थ चमचा टाइप व चुगलखोरों की गैलेक्सी की बजह से होती है और उसकी टीम की कार्य शक्ति को बुरी तरह प्रभावित  करती है ।  @vinod k Tripathi ji


Vikram singh bhadoriya TI 

Ghatigaon  28-1-15 o