शनिवार, 7 अक्टूबर 2023
पुस्तक समीक्षा : विश्वगाथा वैभव
शुक्रवार, 6 अगस्त 2021
वक्त की टहनी पर लौट आया है वसंत ६
शनिवार, 27 मार्च 2021
दस्तान-ए-अंजुमन (मजमुआ-ए-नज्म) व कलम् शायरा - - दुआ प्रोमिला,,, ऑकलैंड, न्यूजीलैंड
रविवार, 26 अप्रैल 2020
मत रोको इन्हें
गुरुवार, 12 मार्च 2020
Basanti vayaar main
वसंती वयार में ,
खयालो की शाख पर झूमता पागल पन
तुम्हारी यादों की डोर थामे
प्रेम पथिक.
चल रहा
वीते हुये इतिहास का पाथेय लिये ,डगमग पग
विकल ह्रदय, विचलित मन,
पलास सा दग्ध. हुआ है दिग दिगंत ..
विक्रम सिंह भदैरिया 18-3-14
रविवार, 11 मार्च 2018
प्रलय मेघ
गुरुवार, 28 सितंबर 2017
रविवार, 3 सितंबर 2017
EK KHOI HUI SI KAVITA
गुरुवार, 24 अगस्त 2017
समर्पण
मंगलवार, 22 अगस्त 2017
सोमवार, 21 अगस्त 2017
तुम्हारे क़दमों की आहट
हायकू १
शनिवार, 19 अगस्त 2017
घोंघा वसंत
सोमवार, 14 अगस्त 2017
बात कुछ वनी भी थी
सोमवार, 31 जुलाई 2017
हुँह नींद में तो बस ऐसे ही लिखा जाता है
मंगलवार, 4 जुलाई 2017
गुरिन्दर दी सिपियाँ अहसास दीं
डाॅ गुरिन्दर गिल "गौरी " जब भी कुछ लिखतीं हैं वह मुझे समालोचना के लिये ज़रूर भेजती है । पर यह मेरा दुर्भाग्य ही था कि उसकी "नग़मा -ए-ज़िंदगी " के वाद प्रकाशित काव्य संग्रहों का मैं प्रमाद वश आलोचनात्मक अध्ययन करने से महरूम रहा हूँ । इसके लिये मुझे गुरिंन्दर की नाराज़गी भी झेलनी पड़ी व उलाहना भी सुनना पंड़ा ।इस नाराज़गी के बावजूद भी ,अभी कुछ दिन पहले उसने अपने नये प्रकाशनाधीन काव्य संग्रह "सीपियाँ एहसास की " की सभी कवितायें ई मेल से भेजीं हैं और साथ में धमकी भी दी है कि अगर इस वार मैंने उन्हें पढ़ कर अपनी अभिव्यक्ति टीप नहीं भेजी तो वह ज़िंदगी भर मुझसे बात नहीं करेगी ।
मंगलवार, 11 अप्रैल 2017
हिंदी भाषा का नया पिंगल शास्त्र
रविवार, 12 मार्च 2017
शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016
नया साल मनाने के ईसाई ,मुस्लिम व हिन्दू सोच
बुधवार, 30 नवंबर 2016
गुरिन्दर के "शब्दों के सफर "पर कमैंट
पाँच साल पहले @Dr Gurinder Gil "Gauri " की पहली कविता जो मैंने पढ़ी "ज़िंदगी " नाम से ही थी । जो ज़िंदगी का फ़लसफ़ा लिये उगते हुये प्रेम का एक अँखुआ ,सुनहरी धूप में गुनगुनाता पल्लवित होता" प्रेम वृक्ष " फिर बुढ़ापे की तरफ़ लम्बे लम्बे डग भरता , जीवन के संघर्ष से थका हारे प्रेम पथिक और अंत में उड़ती हुई शम्शान की राख के साथ अनन्त के अथाह सागर में विलीन होती ज़िंदगी का फ़लसफ़ा लिये. यह अकेली कविता ही मानो भविष्य के उनके कविता संग्रह "राज- ए- दिल " (सन् २०१३ ) ,नग़मा -ए-दिल ( २०१४) "इस मुक़ाम पर " ( २०१५ ) तथा इसी वर्ष प्रकाशित सूफ़ियाना "करम फरमाई " के बाद अब सन् २०१६ में ही सद्य:प्रकाशित व व पंजाब कला एवं साहित्य अकादमी "पंकस" केमँञ्च से लोकार्पित इस कविता संग्रह "शब्दों के सफ़र "में प्रतिबिम्बित हो रही थी।
"शब्दों का सफर " में सन्नहित "गौरी " गुरिन्दर गिल की कबिताये ं भी पाठक को कभी उगते हुये सूरज की स्वर्णिम लालिमा और मलयज पवन की शीतल सुगंधित वयार सा आभास लिये " ... तो कभी
दोपहर की चिलचिलाती धूप में तपते हुये लाल लाल आँखों वाले सूरज तले ज़िंदगी के संघर्ष मैं प्यार और मनुहार और तमस की धूप छाँव लिये कसमसाती हुई ज़िंदगी के गीत गाती हुंईं मिलतीं हैं ,
तो कहीं शाम को थके पाँव घर लौटते हुये श्रमिक की क्लांत वेदना लिये तो कभी ,अल्लाह की याद में अजान के गूँजते हुये स्वर , उनींदी आँखों से सृष्टि को निहारते , नींद से बोझिल पलकें लिये विश्राम कक्ष की ओर जाते हुये शाम के सूरज और समुद्र की रेत पर गिर कर छपाक की ध्वनि के साथ शांत होती समुद्री लहरों के स्वर सा अहसास कराती हैं । सूफ़ियाना कविताओं का " यह शब्दों का (सुहाना ) सफर " सचमुच में डाॅ. गुरिंन्दर गिल "गौरी " की कविताओं के रूझान , उत्थान व चरमोत्कर्ष की ओर जाती हुई, हिन्द के पंजाब से मलय एशिया तक हिन्दी साहित्य की सेवा में लीन"एम्बेसडर आॅफ हिंन्दी " अवार्ड से विभूषित कवियत्री की कविता के सफ़र के सफ़रनामा का । ...... यह सार संक्षेप है ।
ईश्वर से प्रार्थना है । यह मलेशियाई हिन्दी साहित्य के माथे की विंदी में टाँकी गई हीरक कणिका सी यह कवियत्री "गौरी " गुरिन्दर गिल हिंन्दी साहित्य के आकाश में चमकता सूरज बने । एवमस्तु ।।
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