शनिवार, 7 अक्टूबर 2023

पुस्तक समीक्षा : विश्वगाथा वैभव

 पुस्तक समीक्षा 
#विश्वगाथा_वैभव  
(हिन्दी साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका #विश्वगाथा में विगत 10 वर्षों में  प्रकाशित हुयीं  चुनिंदा रचनाओं का संकलन) 
सम्पादक:  - डाॅ. प्रमोद कुमार तिवारी.

 11 मार्च 2023 को  लब्ध प्रतिष्ठ सम्पादक श्री #पंकज_त्रिवेदी जी की षष्ठीपूर्ति के अवसर पर और  उनकी  विश्व स्तरीय  हिन्दी साहित्यिक पत्रिका  #विश्वगाथा के प्रकाशन के दशाब्दी वर्ष  में प्रवेश के अवसर पर   श्री प्रमोद कुमार तिवारी जी  ने इस में  अब तक प्रकाशित हुयीं विशिष्ट रचनाकारों की चुनिंदा रचनाओं का संकलन #विश्वगाथा_वैभव के नाम से सम्पादित व प्रकाशित कर  लोकार्पिक किया  था.

 बहरहाल व्यक्तिगत आग्रह और एक लम्बे इंतजार के बाद गुजरात सुरेन्द्र नगर की ज्ञानिनी वारी के महकते उपवन में  वट बृक्ष सी उगी इस लब्धप्रतिष्ठ  त्रैमासिक हिन्दी साहित्यिक पत्रिका  #विश्वगाथा के  दशाब्दी अंक #विश्वगाथा_वैभव... की बहुप्रतीक्षित प्रति आज ही डाक से प्राप्त हुयी है.
 ....इसके तप्त वारिद सम घनश्याम मुख पृष्ठ पर  उत्ताल तरंगित इक नदी है, नदी में एक  नाव है  और नाव में  वैठी  है एक विवस्त्र आकृति. जिसकी श्वेत श्याम छवि और उससे भी बड़ी होती...  व्योम में पसरी हुयी  उसकी परछांईं को देख कर .. मन कुछ ठिठका कुछ  चिहुँका.. .पर तभी #श्री राम परिहार जी की रचना  #शब्द_बृ़क्ष  पर दृष्टि फिरी.. वहाँ था "हरेपन में पानी और पानी में थी जीवन की कहानी और आगे थी ".. .. यह नदी... नदी में नाव... और नाव में वैठा हु़आ यह नगां पुंगा चुप.... जो शायद  #नरेन्द्र_रावत जी की कविता"  मौन, /थकान और सुबह" से निकल कर उदास होकर  यहाँ आ वैठा था ... यहाँ इस नाव में...."मौन..  /अर्थ की झील में वैठा हुआ /शब्दों को पत्थर मारता हुआ..???  हारा थका सच.....
  ... और वह नदी???... जो है.. तरल सरल ... #भावना_भट्ट  के #संगम_तीर्थ में स्नान करती हुयी नदी...  कि ...इक" हवा के झौंके ने... हौले से गाल चूमा है नदी का और तभी से नदी के मन ह्रदय में लहर उठ गयी है.... जो अब तक वह अनवरत दौड़ रही है सागर की ओर... और साथ में है.. उस नदी में बहती भव सागर के भँवर में तिरती... यह निर्द्वंद भाव की नौका भी.. और साथ में है  नाव में वैठा हुआ यह खामोशो मलूलो तन्हां.. आखिर ... है  कौन??...  
                     इस बार उत्तर तलाश में   पाठक मन  ने जब उझक कर देखा  #उमा_झुनझुनवाला जी  की "एकऔरत की डायरी " के पन्नों में ...  "तो कहानी कुछ यूँ चली कि "शाम का वक्त था, औरत और मर्द खामोश वैठे थे, नाव में.. मनु और श्रद्धा की तरह... नदी भी बड़ी खामोश थी. सब कुछ बहुत ठहरा हुआ सा... दोनों ने नदी का जल अपनी अँजुरी में भरा.. और इस दुनियां को सरल बनाने की कसमें खाईं और फिर एक दूसरे को चूमा.......! 
... नदी शांत थी.... मन भी शांत था ".... लेकिन... पर..अब ....वह औरत..? औरत कहाँ थी? कहाँ गयी होगी आ़खिर वह औरत??  
   .... तब इस समस्या का  समाधान सुझाते हुये व्यंगकार श्री  #शंकर_पुणताम्बेकर जी ने लिखा... कि वह औरत..... दर असल" वह औरत एक  #आम_आदमी थी..... और कहानी कुछ यूँ थी .. कि.. "नाव चली जा रही थी..... मझधार में नाविक ने कहा, नाव में वो़झ ज्यादा है, कोई एक आदमी कम हो जाए तो अच्छा है, वर्ना नाव डूब  जायेगी
  .... नाव में सवार थे एक डाक्टर, अफसर, वकील व्यापारी, नेता..और आम आदमी..यानी कि वह आम औरत  .. और सब चाहते थे कि यह औरत पानी में कूद जाय... पर वह कूदना नहीं चाहती थी..  वह   कूद भी जाती शायद.... परन्तु.... तभी उस औरत के मन के द्वंद को और भी दुधर्ष करते हुये.. हिंदी की एक देदीप्यमान नक्षत्र Urvashi Bhatt ने भी अपनी" #शुभेच्छा" के साथ साथ उसे अपनी  #दृष्टि भी देते हुये  ... कहा... 
... "स्त्री तुम /दृष्टा बनी रहो/मुक्ति प्रहसन के /आयोजनों की /स्थिर रह कर स्व पर /अपने पथ स्वयं निर्धारित करो...." 
     लेकिन उसका  "  #सा़क्ष्य..". . यह   था... कि  वह  औरत.. .. अपने "भीतर मरती हुयी कहानियों की /एक मात्र दृष्टा होने के बावजूद /साक्ष्य के अभाव में /असहाय है... 
       परन्तु फिर भी , मर मिटने की इस चाहत के साथ भी एक.. #शुभेच्छा..  है जो आज भी जीवित है,स्त्री के ह्रदय में /जो हर प्रताड़ना और पीड़ा को विस्मृत कर पूछती है..." कूद तो जाऊँ... /पर प्रिय... /... मेरी इस अँजुरी भर /प्रार्थना का क्या होगा"... 
  ... और.. तभी नाव में  सवार नेता ने जोर शोर से एक ओजस्वी भाषण पढ़ा.. स्त्री तुम शक्ति हो.. स्वाहा हो... स्वधा हो.. तुम्हीं हो जो शिव बन कर गरल पी सकती हो...तुम. कूद जाओ भँवर में... और जोश में आकर वह औरत पानी में कूद गयी... और उसके बाद से #उर्वशी भी गुमसुम हैं. .. तीन कवितायें सुनाने के बाद  से...! ... स्त्री की #निर्वस्त्र" जिंदा लाश को विसूरते हुये...  वह कहती है... "सुख की स्थूल परिभाषा पकड़ कर  जहाँ हम खड़े हैं वहाँ जीवन शून्य है"....
उधर भव सागर में डोलती उस नाव में वैठा वह नाविक भी चुप है... डाॅ. नरेन्द्र कोहली की कविता "#मौन_थकान_और_सुबह  को पढंता हूआ. "चलो मौन" निशब्द कविता बनायें एक... 
 ... परन्तु यह पाठक मन... वह विश्वगाथा वैभव  को आगे पढ़ता हुआ सोचता है....  जो भी हो... पर नाव से गायब हुयी वह औरत डाॅ. #हंसा_दीप की #मधुमक्खी की तरह तो कदापि नहीं हो सकती . वर्ना वो नेता के मुँह से अपनी झूँठी तारीफ सुन कर इस तरह से नदी में कभी नहीं कूदी होती...! 
      तो दूसरी तरफ औरत की चिंता में बूड़े हुये #ममता_कालिया जी के "विकास" पुरुष और अन्य कइयों के बीच "पुरुषों के कई सैट एक साथ सक्रिय थे, - छेड़खानी करने वाले पुरुष, निगह वानी करने वाले  , वीडियो फिल्म बनाने वाले  और समाचार लिखने वाले पुरुष".. दर असल इन लोगों को  "औरतों का दगड़ - दगड़ बाजार घूमना पहले भी नापसंद था.. इसलिये उन्होंने उस औरत को नाव से उतार कर  घर भेज दिया था क्योंकि "गैस खत्म हो चुकी थी और वह औरत शकीला  पुराना चूल्हा उतार गीली लकड़ियों से जूझ रही थी".. .  और पुरुष के सारे  समुच्चय फिर उस औरत की चर्चा करने  उसी डाल पर आकर लटक गये थे.. उल्टे पाँव धरे वेताल की तरह. 
  .इधर... #संगम_तीर्थ में... "पानी में तैरतीं #भावना_भट्ट की काली और रुपहली आँखों वाली मछलियाँ अपनी भंगिमा से जल को नचा रहीं हैं. वह शायद उस औरत की तलाश में हैं जो अभी अभी नदी में कूदी थी... या फिर उस औरत के जो गैस खतम हो जाने पर  लकड़ी के चूल्हे के क्रास पर ईसा मसीह की तरह झूल रही है. 
   ... पर भावना_भट्ट जी का यह भी कहना है कि वह औरत शायद मीरा थी, जो  नदी बन कर आई और एक नीले सागर में समा गई. 
          विश्वगाथा वैभव की यह आँशिक गा़था तो बस  एक वानगी है. इसके भीतर समेटे गये विश्व हिंदी साहित्य के वैभव और सौन्दर्य की... जो किताब के कलेवर को देखते ही पाठक के मन में हिलोर बन कर उठती है. और पसर जाती है जहाँतक उसकी नजर जाती है... कि आगे वहुत कुछ है  यहाँ... वहाँ.. #सूर्यवाला की " सुनन्दा छोकरी की डायरी" है... डाॅ. सुधा ओम ढींगरा की "इस पार से उस पार" तक.. मोहसिन खान की "सलमा की विदाई"... #अनामिका_अनु , अनिता सिंह, अनुराधा त्रिवेदी और ईप्सिता त्रिवेदी की ओडिया कविता.. यानी असली लुत्फ तो अभी आना बाकी है.. क्योंकि.. किताब बाकी है.. सब कुछ पढ़ना बाकी है.. और आलोचक कम पाठक की कलम भी अभी बाकी है..  इसलिये.. भी.. पाठक तुम अभी आगे पूरा पढ़ो इसे... 🌺🌺🌺🌺🌺🌺 इति. 
विक्रम सिंह भदैरिया 
२६ जुलाई बुधवार 
ग्वालियर (म. प्र.) 
 पोस्ट - 6-10-2023

शुक्रवार, 6 अगस्त 2021

वक्त की टहनी पर लौट आया है वसंत ६

वख्त की सूखी हुई टहनी पर 
लौट आया है फिर से वसंत ......
तुम्हारी भेजी हुयी 
टहनी 🌿 की कलम (बूटी) 
नेह की बारिष में 
भीग कर 
अब भरा पूरा बृक्ष 
 बन चुकी है 
लहलहा उठे हैं 
उपवन में, नव किसलय किंसुक कुसुम
लौट आया है देखो! 
फिर से
वह कुसुमाकर
पुष्पायुध लिये... 

विक्रम सिंह भदैरिया 
24 - 5-—2014

शनिवार, 27 मार्च 2021

दस्तान-ए-अंजुमन (मजमुआ-ए-नज्म) व कलम् शायरा - - दुआ प्रोमिला,,, ऑकलैंड, न्यूजीलैंड

मेरे दुश्मन
सोचती हू़ँ
तेरी यादों को मैं आग लगा दूँ
इस कदर सुलगती हैं
जैसे लेबान जलता हो हर पल
क्या इनका धुआं नहीं पहुँचता तुम तक
या फिर 
तुम्हें आदत होगई है
अश्कों से आग बुझाने की,,,
आदरणीया प्रोमिला दुआ जी का यह नज्म संग्रह जब मुझे मिला मन अन्यमनस्क था, बुझा हुआ, पढ़ने लिखने से तौवा किया हुआ. पर जब यह मजमुआ - ए-नज्म पेशे नज़र हुआ तो खुद को पढ़ने से न रोक सका और पढ़कर इतना  हस्सास हो उठा कि कलम खुद व खुद इसपर त़फ़शरा लिखने वैठ गई.
,,,,,,, प्रोमिला दुआ जी की यह मजमुआ-ए-नज्म यह "दस्तान-ए-अंजुमन" की नज्में हैं या रुबाई हैं या और कुछ है, पर मेरी नज़र में तो यह,, दास्तां - ए-सुखनवर हैं, किसी तृषित दिल की दुआयें हैं, जो नस्र की गईं है किसी प्यारे से दुश्मन के नाम पर. यह सुलगती हैं दहकतीं है, इनमें आहों का धुंआ भी उठता है ़और लपटें भी,,, पर यह सब घटित होता है एक हस्सास दिल के तहखाने में, जहाँ पिघला हुआ इक लावा है जो तप्त तरल हो वह निकलता है, गर्म और खारे पानी का ़इक सोता बन कर...
"कलम भी सिसकती रही है/लफ़्जों के गले मिलकर /शायद तुम समझो /शायद न समझो,,," 
दुआ प्रोमिला जी की इस मजमुआ "दास्तान - ए-अंजुमन की हर नज्म यादों का एक पहरहन है, इक हस्सास रूह का  कलामे दुआ है, इक दालान है किसी के विछोह के मकां का जहाँ यादें वैठ कर सिसकती है,  इक दूजे के गले लग कर, वह झगड़तीं है, उस दुश्मन से, जिसके वगैर वह जिंदा नहीं रह सकतीं...
...... इस मजमुआ की हर इक नज्म इक मकां है जिसकी दीवार पर छतराये हुये हैं कांपती हुई रूह के मोहब्ब के रंग..,,,, जिसके करीब है, जलता हुआ इक माजी का आलाव है, राख में डूबी हुई चिन्गारी है, राख हो चुके लम्हे  हैं और कुछ टूटे हुये कु़छ जलते हुये सपने हैं . जहाँ वैठ कर दुआ जी की नज्में "ऊन के गोले जैसी जिंदगी को लपेटते लपेटते मन की सलाइयों पर अनगिनत ख्वाब बुनतीं" नजर आतीं हैं.
..... इस मजमुआ की हर नज्म कितने ही गम, कितनी आहें, कितने वेताब हसरतों के जनाज़े अपने कांधों पर उठाये हुये चलती है, वहजो लवरेज हैं, उन "सिसकियों की आहट से/ जो दबीं है सदियों से/ किसी के खामोश लवों पर /और वेताब हैं किसी काँधे के लिये/ जहाँ वो रख सकें /अपना सर/ और पा सकें सकून पल दो पल के लिये...." 
..... कहीं  कहीं तो अश्क-ओ- हस्सास की हमदम, यह नज्में, निराशा के गर्त में इतने गहरे तक डूब जातीं हैं कि वह  कह उठतीं है,,,, "कैद है/ रूह मेरी /जिस्म के ताबूत में /जो रूह निकले/तो तू निकले /जो तू निकले /तो रूह निकले /,,,, और जब शायरा का अशांत जेहन कुछ शांत होता है कभी, तो कह उठता है,," कुछ अनकहे शब्द /कुछ खामोशी लफ्जों
 की / न क़ातिल मेहरवां न मौत /मिट्टी मिट्टी में मिलती रही / कभी जिस्म मिट्टी  का /कभी ज़ज्वात मिट्टी के,,,,"
,,,,,, इस मजमुआ की कुछ नज्मों में  लीक से हट कर  मुस्कराहट के मौजूँ भी हैं, कुछ समाज पर, कुछ हालात पर कटाक्ष करती नज्में भी हैं,,, कुछ सूफियाना कलाम भी हैं यहाँ" वक्त की रेत पर /गिर कर सूख गईं /शबनम की बूँदों की तरह,,,,,, वो आँसू /आज तक न टपका आँख से मेरी/जिसमें मैने /जमाने भर की मुस्कराहटें छुपा रखीं थीं.,, 
,,,,और अंत में वह शायरा लिखती हैं,,, 
" मैं खुश्क रेत हूँ/ और आंधियों की ज़द में हूँ/मुझे समेट ले मेरे मालिक के कहीं विखर न जाऊँ मैं,,,
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, विक्रम सिंह भदौरिया
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, 27-March 2021
B-1176 आनन्द नगर, ग्वालियर, 474012

रविवार, 26 अप्रैल 2020

मत रोको इन्हें

मत रोको इन्हें .....मोमबत्तियाँ जलाने से  ......ृ! 

इक रौशनी का दिया जलाओ तो सही .....
और चलो तो सही ...
यह सोच कर  कदम बापस न खींचों कि अँधेरा कितना बड़ा है और तुम्हारे दिये का प्रकाश कितना छोटा सा ...
..कदम दर कदम अँधेरे को चीरते तुम्हारे ये कदम ....
..और यह कदम दर कदम तुम्हारा साथी.... 
...यह छोटा सा दिया ...
  यह छोटी सी रौशनी ..
  यही तुम्हें मंजिल तक लेकर जायेगी ..
...जमे हुये मौन को पिघल कर मौम  सा जलने दो ......
मत रोको .... 
इन चीखों को .......
.ये चीखें हैं प्रलय के आने की आहट हैं ...
..मत रोको इन्हें ........
 Kr.vikram singh april 2013

गुरुवार, 12 मार्च 2020

Basanti vayaar main


रंगों के मौसम में  दिल का हर कौना है रंगीन ....

वसंती वयार में  ,

खयालो की शाख पर झूमता पागल पन

तुम्हारी यादों की डोर थामे

 प्रेम पथिक.

 चल रहा

वीते हुये इतिहास का पाथेय लिये ,डगमग पग 

 विकल ह्रदय, विचलित मन,

  पलास सा दग्ध. हुआ है दिग दिगंत ..

                                    विक्रम सिंह भदैरिया 18-3-14

रविवार, 11 मार्च 2018

प्रलय मेघ

मत रोको
घुमण आये 
काले मेघों को 
नयन की कोर पर

घिर आई है घटा
बरस जाने दो  

चपला संग
नृत्य करते
विद्युतजिव्ह मेघ यह
दरकते हुये
हिमखणड लेकर
 
ह्रदय की पीर को 
करने दो कुछ पल 
दुधर्ष तांडव
प्रलय के काल मेघों 
संग 
बहुत हुआ 
अब

विखरने दो 
टूट कर
हो ज़़ाने दो खण्ड खण्ड
यह पाखण्ड सब

विक्रम सिंह भदौरिया 
२९,-७-२०१९

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

रविवार, 3 सितंबर 2017

EK KHOI HUI SI KAVITA


EK KHOI HUI SI KAVITA 

एक खोई हुई सी कविता
वैठी है 
समय के धुँध में ,
यादों की डोर पकड़े
सपनों के अंतहीन छोर पर

दिल के लम्बे हाथ...
अनन्त सरल रेखा वन कर
चाहते हैं छू  लेना उसे

ओह  ! अनन्त !
पूर्णता की राह में
पूर्णँ शाँति के शून्य से
निकल कर
परम् शाँति के शून्य में 
विलीन होता हुआ
रेखा गणित के विंदु सा 
 असितित्वहीन मैं ......!

..._ k_vikramSingh
8-4-2014 GhatiGaon 
   Gwalior 

Photo curtsy Kamlesh Chauhan "Gauri "

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

समर्पण

सचमुच 
मेरे शब्द पिघल उठ्े हैं 
तुम्हारी कलम की आँच से  
तपिश और जिजीविषा से 
हार कर
देखो 
हथियार जमीन पर रख दिये हैं मैने
पूर्ण समर्पण 
  विक्रम २३ -८-२०१७

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

सोमवार, 21 अगस्त 2017

तुम्हारे क़दमों की आहट

ह्दय के तारों को झंकृत करती
तुम्हारे कदमों की आहट
हवाओं और फिजांओं में घुली खुशबू 
तुम्हारे वहाँ होने के अहसास
से वाकिफ हूँ 
पर जमानै मैं और भी हैं 
जालिम, जेल और जेलर
कर्म और कर्तब्य की वेड़ियां
जो छीजतीं है
तुम्हारे वहाँ होने के अहसास को 
गुलाब की पँखुड़़ियों पर पड़ती
हथौड़े की चोट की तरह

K_vikramSingh
19-8-2017 Bhind

Posted at fB

हायकू १

उनींदी आँखे
स्वप्न भरी तरी
साहिल कहाँ----

    K_vikramsingh
22-8-2017 Kyari pura 
      Bhind (mP) 
Also posted on FB 

शनिवार, 19 अगस्त 2017

घोंघा वसंत

मैने कुछ नहीं लिखा जी 
लेकिन तुम , 
तुम तो आशु कवि हो 
यकीनन 
और में 
पेड़ की शाख पर वैठा हुआ
कालिदास का  
पूर्वार्ध .....
अपनी ही शाख को काटता हुआ 
घोंघा वसंत 
मैं ................!

Vikram singh bhadoriya
19-8-2017

सोमवार, 14 अगस्त 2017

बात कुछ वनी भी थी

बात कुछ बनी भी थी 
कि हाय तुम छिटक गयीं 
ओस की बूंद सी 
दूब पर परी खिलीं 
रश्मियाँ रवीश की
इंद्र धनुष सी बनी
तनी तनी सुहासिनी
स्मृतियों के छोर सी।

बरस के बादल चुके 
झुके झुके उदास से
पर न तुम तब रुकीं
मृग मरीचिका वनीं
रेत पर गई छली 
हाय अतृप्त प्यास सी
      K_vikramsingh
     13-08-2017
B-1176 आनन्द नगर , सागर ताल मार्ग 
ग्वालियर म.प्र भारत 
    gwalior चित्रांकन गूगल से साभार 


सोमवार, 31 जुलाई 2017

हुँह नींद में तो बस ऐसे ही लिखा जाता है

हुँह नींद में तो बस ऐसे ही लिखा जाता है 
यथार्थ के कंकड़ से भी कहीं पानी बिखर जाता है?
यथार्थ के कंकड़ से उठती है हिलोर
ठहरी हुई स्मृतियों की झील के स्तब्ध पानी में
और तुम्हारा वह 
चन्द्र किरणों के बीच
झिलमिलाता हुआ बिंम्ब
न जाने कितनी किरणों से
बिखेर देता है तुम्हारी यादों को
हज़ारों हजार चाँद के टुकड़ों में 
छिटक कर, तब
मन के आँगन में 
बिछी हुई चाँदनी सी
मुस्कुराने लगती हो तुम ।।
      K_vikramsingh
           विक्रम ३.०६ पूर्वाह्न

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

गुरिन्दर दी सिपियाँ अहसास दीं

    
      

      डाॅ गुरिन्दर गिल "गौरी " जब भी कुछ लिखतीं हैं वह मुझे समालोचना के लिये ज़रूर भेजती है । पर यह मेरा दुर्भाग्य ही था कि उसकी "नग़मा -ए-ज़िंदगी "     के वाद प्रकाशित काव्य संग्रहों का मैं प्रमाद वश आलोचनात्मक अध्ययन करने से महरूम रहा हूँ । इसके लिये मुझे गुरिंन्दर की नाराज़गी भी झेलनी पड़ी व उलाहना भी सुनना पंड़ा ।इस नाराज़गी के बावजूद भी ,अभी कुछ दिन पहले उसने अपने नये प्रकाशनाधीन काव्य संग्रह "सीपियाँ एहसास की " की सभी कवितायें ई मेल से भेजीं हैं और साथ में धमकी भी दी है कि अगर इस वार मैंने उन्हें पढ़ कर अपनी अभिव्यक्ति टीप नहीं भेजी तो वह ज़िंदगी भर मुझसे बात नहीं करेगी ।
        मेरी प्यारी यह नकचढ़ी बहन गुरिंन्दर जब भी लिखने वैठती है तो वह हड़बड़ी में अक्सर यह भी भूल जाती है कि, कौन साथ चला कौन पीछे छूट गया । किसको धौल पड़ी और किसको टँगड़ी मारी ,उसके "शब्दों के सफर " में सारे के सारे विचार ,एहसास ,छंन्द और लय सब कुछ गड्डमगड्ड  व चकरघिन्नी होते नज़र आते है । लिखते वक़्त उसे बस एक ही फ़िक्र रहती है कि कहीं कोई एहसास कोई  "राज ए दिल " कोई भी भावावेश कागद पर उकेरे जाने से बच न पाये । 
     यूँ तो सीपियाँ चुनने व सहेजने का शौक़ उसे बचपन से ही रहा है । जब वो माँ के साथ अमृतसर में हरमन्दिर साहब में मत्था टेकने जाती थी तब वहाँ के अमृत सरोवर में डुबकी लगा कर छोटी -छोटी सीपियाँ ढूँढ कर निकाल लाती,खेल खेल में ही उन सीपियों में मानवीय अहसास की कल्पनाओं के मोती सजाती , उन्हें  सवाँरती ,जब शादी के बाद वह मलय एशिया पहुँची तो वहाँ भी उसने लातार दातू की "भाषा" के समन्दर की मनचली लहरों द्वारा समय के साहिल पर छितरा दी गईं मानवीय संवेदनाओं की सीपियों को चुनना व सहेज कर रखना अपना शग़ल बना लिया ,और आज उसकी चुन चुन कर सहेजी गईं ये सीपियाँ मानवीय अहसासों  के साहित्यिक मोतियों से लवरेज हैं । 
      अमृत सरोवर से ली गई   "पंजाबी " की मिठास ,लखनऊ की "उर्दू " की नफ़ासत के साथ लातार दातू की  "भाषा"  के समन्दर के ख़ारेपन का अहसास लिये ,डाॅ.गुरिंन्दर गिल "गौरी" की यह काव्य रचनाओं के मोतियों से भरी सीपियाँ उसकी क़लम के आवे- जमजम  के काव्य  निर्झर से  नि:सृत कल कल निनाद करती  सरिता में , व-रास्ते  "राज-ए-दिल"  प्रवाहित होतीं  व " नग़मा-ए-ज़िंदगी "(२०१४) "इस मुक़ाम पर "(२०१५) "करम फरमाई "(२०१६) के  "शब्दों के सफर" (२०१७)में प्रवाहमान गुरिन्दर की सद्य:प्रकाशित यह   "सीपियाँ एहसास कीं " सचमुच अपने आप में सागर को समाहित किये हुये हैं । सास्नेह । 
         इस काव्य संग्रह में उसकी कविताओं में "वक़्त को मुट्ठी में बंद कर लेने की ख़्वाहिश " "दीन ओ ईमान  की वातों "में क़त्लेआम आम मचाने का दर्द ,अपनी मात्ृ भूमि पर नेताओं के हुड़दंग पर आक्रोश " जब भी देखूँ मैं अपने हिंन्दुस्तान को " में ध्वनित हुआ है तो " पत्थर के घरों में रहते पत्थर " मैंने देखा है सड़क पर चीथड़ों में लिपटी लाश " , में जहाँ सारे जहाँ का दर्द का एहसास कवियत्री की क़लम को दर्द लिखने को वेताव वेगास किये दिखता है , वहीं " कहाँ से आरहा है इंसान " कविता में वह वेद व उपनिषदों के सृष्टि व समष्टि के उद्भव  के विषय पर भी गंम्मीर से अपने विचार रखती है । लेकिन इस सब के बावजूद वह अपनी क़लम की असमर्थता से वेगार लिखती है कि  " मेरे लफ़्ज कहते हैं चीख़ चीखँ कर ,कि मैं लिखूँ मगर मुझे लफ्जों से नहर सजाना नहीं आता "  यह मानवीय संवेदनाओं को जस का तस कागद पर उकेरने की उसकी तड़प ही है जो गुरिंन्दर की क़लम की धार को कभी कुंन्द नहीं पड़ने देती । साधुवाद । सास्नेह  । 
  
                       विक्रम सिंह भदौरिया
                   B-1176 आनन्द नगर,वहोड़ापुर 
                    सागर ताल मार्ग , ग्वालियर ,         
                      ( मध्य प्रदेश ) भारत 

मंगलवार ,१३ जून २०१७ ग्वालियर

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मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

हिंदी भाषा का नया पिंगल शास्त्र

आदरणीय Mahesh Katare Sugammahesh जी छन्द पढ़ कर विना समझे भी वाह वाह करना जितना सरल है छन्द रचना करना उतना ही कठिन है फिर छन्द रचना के साथ भाव प्रवाह भी वनाये रख पाना तो सिर्फ उन्हीं कवियों के लिये संभव है जिन पर कृपा राम की होही !  
  पर मेरे जैसे मूसर चंद अकवि के लिये तो यह वहुत दूर की कौड़ी है , नाच न आवे आँगन टेढ़ा वाले भाव के अनुसार छन्द को दोष देकर वैठ जाने के वजाय टेढ़े आगन मैं ही बंदर कूदनी नाच नाचने में मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती ा 
 विना छन्द के भी कविता की जा सकती है यह महाकवि निराला पहले ही सिद्ध कर चुके है ।पर विना भाव प्रवाह के कविता जो कि आज के  तथा कथित कवि व चुटकले वाज लिखते है उसे कविता की श्रेणी में तो क्या गद्य की श्रेणी में भी नहीं रखा जा सकता । इसलिये आज जरूरत इस बात की है कि जो भी मूर्धन्य अत्प सख्यक कवि साहित्य जगत में शैष है उनकी एक उच्च स्तरीय कमेटी गठित की जाय व पिंगल शास्त्र में शास्त्रीय छंन्द विधा के नये उप विभाग वना कर उसमें १,बंदर कूदनी छंन्द ,२,कचर कचरा छंन्द ,३पद दलित विगलित छंन्द ४,झकझकिया छंन्द और मूसर चन्दा छंन्द विधा को भी नव हिन्दी पिंगल शास्त्र में प्रतिष्ठित किया जाने की  कृपा की जाय । निवेदक 
Vikram singh bhadoriya 
11-4-2017 Bhind 

रविवार, 12 मार्च 2017

होली २०१७मार्च१२

सुरमई नयनों की कोर से 
रतनारे रुखसारों की लाली
लेकर यह मधुमय वसंत ,
चढ़ आया है देखो पंचसर ,
 ले पुष्पराग यह धनुष तान,
घायल कर डाले सब ह्रदय त्राण
फिर भी है उन्मत्त ,यह प्राण प्राण 
उड़ते फिरते हैं ले रंग संग 
गालों पर मलते गुलाल ....
स्वागत प्रिय सुखकर वसंत ....!
--Vikram singh bhadoriya 
    Holi 12 march 2017 
Photo courtesy Dr Neetu Sikarwar

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

नया साल मनाने के ईसाई ,मुस्लिम व हिन्दू सोच

Happy New Year  पर एक नई खोज .
.......,..
अब ग्रेगेरियन कलेंडर के नये साल की शुरूआत
में वस चंद एक घंटे वाकी है पर एक सवाल कई सालों से मन में घुमड़ रहा था  कि आखिर नया साल  मनाते क्यों है ? तो गूगल बाबा से  पूछ ने की ग़ुस्ताख़ी कर बैठे । और गूगलबाबा ने ढोल की पोल क्या खोली कि बस यूँ समझो कि  ढोल ही फूट गया । बोले नया साल यानि एक जनवरी को ईसा मसीह का नाम करण संस्कार किया गया था  व ख़तना किया गया था सो इसी खुशी में सारे ईसाई एक जनवरी को बहुत उत्साह व समारोह पूर्वक एक जनवरी सैलिब्रेट करते है । 
   अब ईसाई ईसा मसीह को ख़तना किये जाने पर ख़ुश और मुसलमान यह सोच कर ख़ुश कि कम से कम ईसाइयों का मसीहा तो हमारी तरह ख़तना किया गया सो नये साल में ख़तना भाई की जय और इसी बहाने नई साल में इस्लाम में   हराम शराब माई की जय बोलते है !!!! 
    पर एक सबाल अभी भी अनुत्तरित था कि ईसाई और मुसलमान ख़तना करवाने की  ख़ुशी मनायें सो तो ठीक है पर हिन्दू विना ख़तना करवाये ही "
बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना " क्यूँ हो जाता है ? ??  बहुत सेंकने पर दिमाग़ से निकली आँच ने बताया "ग़ुलाम और मालिक का फ़ंडा " यानि १००० साल हमारे मालिक रहे मुसलमान और ४०० वरस हमारे मालिक रहे अँग्रेज ईसाई , सो अगर अपने अब्बा हुज़ूर का ख़तना करवाने की ख़ुशी में मालिक नाचे तो हम ग़ुलाम अपनी वफादारी दिखाने को क्यों ना नाचें ????? सो हम तो नया साल का पहला दिन और हमारे आका के आका के नाम करण व आका के ख़तना पर जी खोल कर नाचते अा रहे है आज भी दारू पीकर दिल खोल कर नाचेंगे व वधाइयाँ गायेंगे । फटाके भी चलायेंगे क्योंकि दीवाली को इन्हीं फटाकों को  हमने अपने भाई बड़े ग़ुलाम अली हाई कोर्ट व ससुर सुपरीम कोरट के कहने पर अपने दिमाग़ से  ग़ुलाम हिन्दू भाई जान की बड़ी वैज्ञानिक प्रदूषण सोच के खरदूषणों के कहने पर अपने नन्हे मुन्नों तो फोड़ने देना तो दूर छूने भी नहीं दिया था । पर लार तो हम भी वहुत टपकाये थे फोड़ने फुडबाने की ख़ातिर । सो आज न हम मानेंगे भइ्य्यन चाहे ससुरवा सुपरीमा कोरट वा भेज दे हमें जेल में । सो सब का नया मुबारिक कहते है   ,, अरे नाहीं ....  हम कहा आप सबन का  हैप्पी न्यू ईअर ।।।। :
Vikram singh bhadoriya 
Aanand Nagar Gwalior 
Re written on 31st Dec 2016

बुधवार, 30 नवंबर 2016

गुरिन्दर के "शब्दों के सफर "पर कमैंट

     पाँच साल पहले @Dr Gurinder Gil "Gauri " की पहली कविता जो मैंने पढ़ी "ज़िंदगी " नाम से ही थी । जो ज़िंदगी का फ़लसफ़ा लिये उगते हुये प्रेम का एक अँखुआ ,सुनहरी धूप में गुनगुनाता पल्लवित होता" प्रेम वृक्ष " फिर बुढ़ापे  की तरफ़ लम्बे लम्बे डग भरता , जीवन के संघर्ष से थका हारे प्रेम पथिक और अंत में उड़ती हुई शम्शान की राख के साथ अनन्त के अथाह सागर में विलीन होती ज़िंदगी का फ़लसफ़ा लिये.   यह  अकेली कविता ही  मानो भविष्य के उनके कविता संग्रह "राज- ए- दिल " (सन् २०१३ ) ,नग़मा -ए-दिल ( २०१४)  "इस मुक़ाम पर " ( २०१५ ) तथा इसी वर्ष प्रकाशित सूफ़ियाना "करम फरमाई " के बाद अब सन् २०१६ में ही सद्य:प्रकाशित व व  पंजाब कला एवं साहित्य अकादमी "पंकस" केमँञ्च से लोकार्पित इस कविता संग्रह  "शब्दों के सफ़र "में प्रतिबिम्बित हो रही थी।  


 "शब्दों का सफर "  में सन्नहित "गौरी " गुरिन्दर गिल की कबिताये ं भी पाठक को  कभी उगते हुये सूरज की स्वर्णिम लालिमा और मलयज पवन की शीतल सुगंधित वयार सा आभास लिये  " ... तो कभी

    दोपहर की चिलचिलाती धूप में तपते हुये लाल लाल आँखों वाले सूरज तले ज़िंदगी के संघर्ष मैं प्यार और मनुहार और तमस की धूप छाँव लिये कसमसाती हुई ज़िंदगी के गीत गाती हुंईं मिलतीं हैं , 

   तो कहीं शाम को थके पाँव घर लौटते हुये श्रमिक की क्लांत वेदना लिये तो कभी ,अल्लाह की याद में अजान के गूँजते हुये स्वर , उनींदी आँखों से सृष्टि को निहारते , नींद से बोझिल पलकें लिये  विश्राम कक्ष की ओर जाते हुये   शाम के  सूरज और  समुद्र की रेत पर गिर कर छपाक की ध्वनि के साथ शांत होती समुद्री लहरों के स्वर सा अहसास कराती हैं ।             सूफ़ियाना कविताओं का " यह शब्दों का (सुहाना ) सफर " सचमुच में   डाॅ. गुरिंन्दर गिल "गौरी " की कविताओं के रूझान , उत्थान व चरमोत्कर्ष की ओर जाती हुई, हिन्द के पंजाब से मलय एशिया तक हिन्दी साहित्य की सेवा में लीन"एम्बेसडर आॅफ हिंन्दी " अवार्ड से विभूषित  कवियत्री की कविता के सफ़र के सफ़रनामा का । ...... यह सार संक्षेप है । 

  ईश्वर से प्रार्थना है । यह मलेशियाई हिन्दी साहित्य के माथे की विंदी में टाँकी गई हीरक कणिका सी यह कवियत्री "गौरी " गुरिन्दर गिल हिंन्दी  साहित्य के आकाश में चमकता सूरज बने । एवमस्तु ।। 


     


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