शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

नया साल मनाने के ईसाई ,मुस्लिम व हिन्दू सोच

Happy New Year  पर एक नई खोज .
.......,..
अब ग्रेगेरियन कलेंडर के नये साल की शुरूआत
में वस चंद एक घंटे वाकी है पर एक सवाल कई सालों से मन में घुमड़ रहा था  कि आखिर नया साल  मनाते क्यों है ? तो गूगल बाबा से  पूछ ने की ग़ुस्ताख़ी कर बैठे । और गूगलबाबा ने ढोल की पोल क्या खोली कि बस यूँ समझो कि  ढोल ही फूट गया । बोले नया साल यानि एक जनवरी को ईसा मसीह का नाम करण संस्कार किया गया था  व ख़तना किया गया था सो इसी खुशी में सारे ईसाई एक जनवरी को बहुत उत्साह व समारोह पूर्वक एक जनवरी सैलिब्रेट करते है । 
   अब ईसाई ईसा मसीह को ख़तना किये जाने पर ख़ुश और मुसलमान यह सोच कर ख़ुश कि कम से कम ईसाइयों का मसीहा तो हमारी तरह ख़तना किया गया सो नये साल में ख़तना भाई की जय और इसी बहाने नई साल में इस्लाम में   हराम शराब माई की जय बोलते है !!!! 
    पर एक सबाल अभी भी अनुत्तरित था कि ईसाई और मुसलमान ख़तना करवाने की  ख़ुशी मनायें सो तो ठीक है पर हिन्दू विना ख़तना करवाये ही "
बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना " क्यूँ हो जाता है ? ??  बहुत सेंकने पर दिमाग़ से निकली आँच ने बताया "ग़ुलाम और मालिक का फ़ंडा " यानि १००० साल हमारे मालिक रहे मुसलमान और ४०० वरस हमारे मालिक रहे अँग्रेज ईसाई , सो अगर अपने अब्बा हुज़ूर का ख़तना करवाने की ख़ुशी में मालिक नाचे तो हम ग़ुलाम अपनी वफादारी दिखाने को क्यों ना नाचें ????? सो हम तो नया साल का पहला दिन और हमारे आका के आका के नाम करण व आका के ख़तना पर जी खोल कर नाचते अा रहे है आज भी दारू पीकर दिल खोल कर नाचेंगे व वधाइयाँ गायेंगे । फटाके भी चलायेंगे क्योंकि दीवाली को इन्हीं फटाकों को  हमने अपने भाई बड़े ग़ुलाम अली हाई कोर्ट व ससुर सुपरीम कोरट के कहने पर अपने दिमाग़ से  ग़ुलाम हिन्दू भाई जान की बड़ी वैज्ञानिक प्रदूषण सोच के खरदूषणों के कहने पर अपने नन्हे मुन्नों तो फोड़ने देना तो दूर छूने भी नहीं दिया था । पर लार तो हम भी वहुत टपकाये थे फोड़ने फुडबाने की ख़ातिर । सो आज न हम मानेंगे भइ्य्यन चाहे ससुरवा सुपरीमा कोरट वा भेज दे हमें जेल में । सो सब का नया मुबारिक कहते है   ,, अरे नाहीं ....  हम कहा आप सबन का  हैप्पी न्यू ईअर ।।।। :
Vikram singh bhadoriya 
Aanand Nagar Gwalior 
Re written on 31st Dec 2016

बुधवार, 30 नवंबर 2016

गुरिन्दर के "शब्दों के सफर "पर कमैंट

     पाँच साल पहले @Dr Gurinder Gil "Gauri " की पहली कविता जो मैंने पढ़ी "ज़िंदगी " नाम से ही थी । जो ज़िंदगी का फ़लसफ़ा लिये उगते हुये प्रेम का एक अँखुआ ,सुनहरी धूप में गुनगुनाता पल्लवित होता" प्रेम वृक्ष " फिर बुढ़ापे  की तरफ़ लम्बे लम्बे डग भरता , जीवन के संघर्ष से थका हारे प्रेम पथिक और अंत में उड़ती हुई शम्शान की राख के साथ अनन्त के अथाह सागर में विलीन होती ज़िंदगी का फ़लसफ़ा लिये.   यह  अकेली कविता ही  मानो भविष्य के उनके कविता संग्रह "राज- ए- दिल " (सन् २०१३ ) ,नग़मा -ए-दिल ( २०१४)  "इस मुक़ाम पर " ( २०१५ ) तथा इसी वर्ष प्रकाशित सूफ़ियाना "करम फरमाई " के बाद अब सन् २०१६ में ही सद्य:प्रकाशित व व  पंजाब कला एवं साहित्य अकादमी "पंकस" केमँञ्च से लोकार्पित इस कविता संग्रह  "शब्दों के सफ़र "में प्रतिबिम्बित हो रही थी।  


 "शब्दों का सफर "  में सन्नहित "गौरी " गुरिन्दर गिल की कबिताये ं भी पाठक को  कभी उगते हुये सूरज की स्वर्णिम लालिमा और मलयज पवन की शीतल सुगंधित वयार सा आभास लिये  " ... तो कभी

    दोपहर की चिलचिलाती धूप में तपते हुये लाल लाल आँखों वाले सूरज तले ज़िंदगी के संघर्ष मैं प्यार और मनुहार और तमस की धूप छाँव लिये कसमसाती हुई ज़िंदगी के गीत गाती हुंईं मिलतीं हैं , 

   तो कहीं शाम को थके पाँव घर लौटते हुये श्रमिक की क्लांत वेदना लिये तो कभी ,अल्लाह की याद में अजान के गूँजते हुये स्वर , उनींदी आँखों से सृष्टि को निहारते , नींद से बोझिल पलकें लिये  विश्राम कक्ष की ओर जाते हुये   शाम के  सूरज और  समुद्र की रेत पर गिर कर छपाक की ध्वनि के साथ शांत होती समुद्री लहरों के स्वर सा अहसास कराती हैं ।             सूफ़ियाना कविताओं का " यह शब्दों का (सुहाना ) सफर " सचमुच में   डाॅ. गुरिंन्दर गिल "गौरी " की कविताओं के रूझान , उत्थान व चरमोत्कर्ष की ओर जाती हुई, हिन्द के पंजाब से मलय एशिया तक हिन्दी साहित्य की सेवा में लीन"एम्बेसडर आॅफ हिंन्दी " अवार्ड से विभूषित  कवियत्री की कविता के सफ़र के सफ़रनामा का । ...... यह सार संक्षेप है । 

  ईश्वर से प्रार्थना है । यह मलेशियाई हिन्दी साहित्य के माथे की विंदी में टाँकी गई हीरक कणिका सी यह कवियत्री "गौरी " गुरिन्दर गिल हिंन्दी  साहित्य के आकाश में चमकता सूरज बने । एवमस्तु ।। 


     


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मंगलवार, 22 नवंबर 2016

प्रधान मंन्त्री को सुझाव

भारत में political system और चुनाव तन्त्र का ढाँचा  पूरी तरह भ्रष्टाचार की कमाई व व्लेक  मनी पर आधारित है। कांग्रेस की कार्वन कापी वनने की कोशिश में भाजपा भी इससे अछूती नहीं रही  है इसलिये पार्टी के लोग भी आपसे डरे हुये हैं । अत: राजनीति से ब्लेकमनी ख़त्म करने के लिये चुनाव सुधार अतिआवश्यक है और इसके लिये आगे आपको वहुत कठिन परिस्थियों से गुज़रना होगा । ब्लेकमनी का ९०%राजनैतिक पार्टियों व इनके नेताओं  के पास ही है । जो आपके सर्जिकल स्ट्राइक से तिलमिलाये हुये हैं हालाँकि डिमोनिटाइजेशन से   इनकी निजी काली कमाई  पर अभी भी वहुत थोड़ा असर ही पड़ा है । इस कालीमनी को समूल नष्ट नहीं किया जा सकता जब तक कि आप  सभी राजनैतिक पार्टियों व इनके नेताओं  व प्रत्येक पदाधिकारी की आमद ख़र्च का एक एक पैसे का हिसाब व आडिट करना अनिवार्य नहीं कर देते । अगर ऐसा हुआ तो 90%राजनेता अपनी दुकान बंद करके राजनीति से ही बाहर होजायेंगे । होसकता है भाजपा के भी कई नेता आपसे रुष्ट होजायें पर   इससे देश का वहुत भला होगा । 
   टैक्स राजा के द्वारा जनता से वसूले गये कर को कहते हैं हमारे यहाँ उल्टे राजा के नौकर राजा से कर वसूल करते है और उसके सामने  टैक्स  का हौआ खड़ा करके चोरी करने के तरीक़े वताते है । 
  क्या ऐसा नहीं हो सकता कि टैक्स का नाम बदल कर उसे "राष्ट्र विकास सहयोग राशि " कहा जाय ताकि कर दाता को वह आत्म गौरव व सम्मान हासिल हो सके जो वह राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में व राष्ट्रीय आपदा के समय दिये गये दान के समय महसूस करता है ? 
 १००% जन संख्या को "राष्ट्र सहयोग निधि में योगदान " (  डायरेक्टर टैक्स ) के दायरे में लाया जाय तथा आय का एक निश्चित हिस्सा राष्ट्र हित में दान करना अनिवार्य किया जाय । रिटर्न भरने के वदले हर कर दाता को  धन्यवाद पत्र लिख कर यह लिखित में वताया जाय कि उसकी सहयोग राशि किस मद में कहाँ उपयोग में लाई गई है । 
           Indirect tax को धीरे धीरे कम किया जाय । सेल टैक्स व सेवा कर जैसे टैक्स की शत प्रतिशत वसूली के लिये अभी कोई प्रावधान नहीं है । दुकानदार ग्राहक से यह राशि वसूल करके स्वयं रख लेता है जो ब्लैकमनी के रूप में समानान्तर अर्थव्यवस्था का हिस्सा वन जाती है । 
वोटर कार्ड की तरह प्रत्येक मतदाता का PAN कार्ड वनवाया जाय ।
     इसके लिये हर छोटे वड़े दुकानदार /व्यापारी के लिये सारा लेनदेन पीओएस मशीन के माध्यम से करना तथा ग्राहक के लिये जनधन योजना के तहत बैंक खाता तथा डेविट कार्ड से ही ख़रीद दारी करना अनिवार्य किया जाना चाहिये । जिसमें हर ख़रीद के लिये PAN नम्बर दर्ज करना अनिवार्य हो । 
  साथ ही POS मशीन में यह व्यवस्था भी हो कि किये गये लेन देन का व्योरा सीधे इनटैक्स आफिस के कम्प्यूटर में व्यक्ति के खाते में एन्ट्री हो सके । 

इनकम टैक्स के अलग अलग स्लैव व उन्हें कम ज़्यादा करके जनता को वेवकूफ वनाने का खेल बंद किया जाय । इसके स्थान पर प्रत्येक परिवार को एक गाइड लाइन के तहत परिवार के  जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति व भविष्य के लिये रोटी कपड़ा व मकान की आवश्यकता के आधार पर एक मानक स्तर वना कर उसमें कम ज़्यादा करने का अधिकार कर दाता स्वयं को दिया जाकर उसकी शेष आमदनी में से मात्र 10%राशि राष्ट्र को समर्पित करने का नियम बनाया जाय । 
 यातायात विभाग द्वारा रोड विकास के नाम पर टोल टैक्स व ट्रैफ़िक पुलिस द्वारा यातायात को प्रभावित नहीं करने वाले कारकों  पर अवैध वसूली बन्द कर  इसके स्थान पर वाहन ख़रीदते वक़्त एक मुश्त रक़म बसूल करना वेहतर विकल्प हो सकता है 
    Vikram singh bhadoriya 
Vill&panchayat Kyaripura p.o.surpura Distt Bhind ( M.p.) 28-4-2017 

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

वंदे अँम्बे

आज से तीन वर्ष पूर्व लिखी गईँ माँ रणचण्डी कालरात्रि के समक्ष की गई अभिलाषा को हमारे रणवांकुरों ने पाकिस्तान के आतंकी सुअर बाड़े में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक करके अक्षरश: सत्य कर दिया है । 
उन्हीं वीरों  के सम्मान में पुन: शेयर कर रहा हू

बंन्दे अंम्बे !  े
न बर दे मुझे न अमर कर दे 

मैं हूँ कपूत तेरा,  रख सका न लाज तेरी 
मार कर लात एक
ठेल कर नरक द्वार 
अन्दर कर  दे 
नर पिशाच भेड़ियों के बीच 
कर सकूँ वध उनका 
बस !  एक खंङ हस्त कर दे । 

बंन्दे अम्बे !  
न वर दे मुझे न अभय दे 
छोड़ दे तू वरद हस्त, बस!
मुष्टि में शत्रु का सर दे  !  
पहिन ले तू फिर से मुंण्डमाल 
लपलपाती जिह्व ज्वाल 
कर संहार पंच मार्ग 
जय चंद ओ मीर जार,
गोरी औ ग़ज़नवी 
सब एक बार,  एक घाट ।

बंन्दे अम्बे !
न वरदे मुझे न  अमर कर दे  ,

उग आये हैं रक्त बीज 
नर पिशाच ओ नराधम 
न तू मुझे शक्ति दे न भक्ति दे 
बस!  भर दे कराल ज्वाल 
उर में,  
अंतहीन,  शत्रु रक्त प्यास दे,  

बंन्दे अंम्बे !  
न बरदे मुझे न अभय दे   .... 

....।  Vikram Singh Bhadoriya 
         
                         

मंगलवार, 27 सितंबर 2016

पत्र प्रधान मंन्त्री नरेन्द्र मोदी जी को

महामना मोदी जी 
      क्या आपकी सभी किसान कल्याण की योजनायें सिर्फँ ढपोर शँख की घोषणायें बन कप रह जायेंगी ? 
 भिंण्ड ज़िला मध्य प्रदेश में 
दलहन उत्पाद बढ़ाने के लिये भारतीय बीज निगम ने वोनी समय निकल जाने के एक माह बाद PU 31 उर्द की दाल का घटिया  बीज सप्लाई किया जिसके पौधे 6" से ऊपर नहीं बढ़े फूल भी नहीं आया मेरी 12वीघा कुल जमीन की फ़सल बर्वाद हो गई । 

फ़सल वीमा योजना 
मेरी पंचायत क्यारीपुरा समेत ३६ पंचायतों के किसानों को विना कारण बताये बीमा नहीं करके बँचित रखा गया । और 
  शेष जिले के किसानों की क़ीमती दाल आदि की फ़सलों के बजाय मोटे आनाज बाजरा भर का वीमा किया गया है । उस बाजरे की वीमा जिसे भैंस को खिलादो तो वह दूध देना बंद कर देती है । 
 अब इस किसान कल्याण को क्या कहें ? आपकी जारी की गईं सभी जन कल्याण कारी योजनायें नकारात्मक सोच बाले  मूर्खँ ब्यूरोक्रेट्स  की भेंट चढ़ चुकीं है और मूर्ख भाजपाइयों के तो कहने ही क्या यह चूहों की तरह आपकी नाव मैं छेद करने में लगे है । 
       सादर 
Vikram singh Bhadouriya 
K_vikramsingh 
E id vikramsinghbhadoriya@gmail.com 
Gwalior ,BHIND M. P. 

रविवार, 14 अगस्त 2016

माँ भारती के चरणों का रक्ताभिषेक कर दे

पूर्व में उगा है आज
लाल लाल आँखों वाला सूरज 
पश्चिम के नालायक 
को देख 
उसकी आँखों में ख़ून उतर आया है 
उठो हे वीर 
वहुत हुआ शाँति पाठ 
उठा खड़ग 
हो अडिग 
युद्ध कर
रणभूमि पर
शत्रु के रक्त से 
रणचण्डी का खप्पर
लवालव भर दे 
पहन ले   आज तू
मुण्ड माल
काट काट 
नापाक भाल 
दुश्मन के लहू से
माँ भारती के चरणों
का 
रक्ताभिषेक कर दे ।

Vikram singh bhadoriya 
15 agust 2016
BHIND published on 
16 Agust 2017 
Gwalior

 

 



रविवार, 31 जुलाई 2016

भारतीय कानून आम जन की त्रासदी की मुख्य वजह

    आदरणीय प्रधान सेवक जी , 

 मुझे अपने मन की बात इस नमो एप पर शेयर करने के अवसर के लिये आप का आभारी हूँ । निवेदन है  कि आज़ाद भारत में आज भी सारे कानून वही लागू है जो अँग्रेजों के द्वारा  राज्य व दवंग व अमीर व अपराधियों के  संरक्षण  के लिये और  इनके द्वारा  ग़रीब आदमी के शोषण व उस पर अत्याचार करने के उद्देश्य से वनाये गये थे ।  इन क़ानूनों में विशेष कर  सिविल व न्यायिक दण्ड प्रक्रिया संहिता में इस वात का विशेष प्रावधान किया गया है  कि  भारत की ग़ुलाम जनता के पीड़ित सदस्य को जीवन भर पुलिस व कचहरी के चक्कर काटने के बाद भी न तो न्याय मिल सके  और न हीं मरते दम तक न्याय मिलने की उसकी उम्मीद ही ख़त्म हो । 

 पर देश आज़ाद होने के 70 वर्ष वाद भी वही कानून लागू है । कानून का पालन करने वाला कमज़ोर व ग़रीब आदमी इस कानून की सहायता से राज्य व दवंग व अपराधियों द्वारा सताया जा रहा हैइससे वड़ा धोखा प्रजा तन्त्र में और क्या हो सकता है । हमारे देश में आम  जनता के साथ होने वाले हर अत्याचार अनाचार दुराचार इन्हीं कानून के तहत  नियम व क़ायदे वना कर किये जाते हैं । । जिनमें से वहुत से क़ानूनों को आप मिटा चुके है पर मुख्य वड़े़ कानून  IPC , CrPC CPC व भारतीय साक्ष्य विधान  के तहत चालाकी के साथ प्रविष्ठ किये गये अन्याय मूलक प्रावधान ही सबसे वड़े अन्याय की जड़ है । जिनमें  वहुत मामूली से फेरवदल व    संशोधन करके इन्हें जन विरोधी से जन हितैषी क़ानूनों में तब्दील किया जा सकता है । 

उदाहरण के लिये .... IPC मैं 

१. ऐसे  सभी अपराध जो राज्य शासन व  दवंग व रसूखदार व्यक्ति व वाहुवली गुण्डे  व साम्प्रदायिक दंगे करने व करवाने वालों के द्वारा , अमूमन  कमज़ोर व शांति प्रिय नागरिकों के विरुद्धँ घटित करते रहते हैं  सभी अपराधों को , को CrPC में पुलिस हस्तक्षेप के अयोग्य यानि "असंज्ञेय " वनाया गया है तथा उनमें सज़ा का प्रावधान भी नाम मात्र को रखा गया ।  इन असंज्ञेय अपराधों में पुलिस को पीड़ित व्यक्ति की 

   FIR लिखने व कार्यवाही करने का अधिकार नहीं होता ।  

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 उदाहरण के लिये धारा 323, IPC के तहत 

             यदि कोई अपराधी किसी के साथ भौथरे हथियार लाठी या लोहे की कांड से या  लात घूँसों व डंडे से मारपीट कर लहूलुहान कर देता है तो तो यह अपराध धारा 323 IPC के तहत असंज्ञेय वनाया गया होने से पुलिस अपराधी के खिलाफ न तो  थाने पर उस पीड़ित की रिपोर्ट पर  FIR लिखेगी और न गुँडे के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही  ही कर सकती है ।  

     ऐसी स्थित वह CrPC धारा 155 के तहत एक असंज्ञेय या अदम चैक रजिस्टर में उसकी रिपोर्ट का संक्षेप लिख कर  उसका  मेडिकल करवा कर तथा न्यायालय में चाराजोई ( प्राइवेट शिकायत करने ) करने की हिदायत देकर  थाने से चलता कर देती है ।

 लेकिन पीड़ित यदि मार खाते बक्त उस दवंग या रसूख़ वाले व्यक्ति को गंदी गाली देता है या फिर जान से मारने की धमकी देता है तो उसी पुलिस थाने में दवंग  की रिपोर्ट पर यह  पुलिस गरीब व पिटने  वाले के खिलाफँ धारा 294 506 IPC  के तहत मुक़दमा क़ायम कर  उल्टे पीड़ित को ही ग़ैर ज़मानती अपराध में गिर्फतार करके जेल भेज देती है । 

  परिणामत: वह पीड़ित व्यक्ति मन ही मन पुलिस को गालियाँ देता अपने घर जाकर बैठ जायेगा या फिर ज़्यादा स्वाभिमानी हुआ तो कानून हाथ में लेकर बदला लेने की सोचेगा । या जैसा कि CJI ने कहा था कि तब वह  माफिया के पास पहुँच जायेगा । 

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  थाने पर F I R लिखाने के लिये  फ़रियादी  यदि असर रसूख़ वाला है या उसकी सिफ़ारिश या फ़ोन करवा कर जाता है या फिर पैसा देता है  तो वही पुलिस उसी असंज्ञ्ेय अपराध को उसकी भाषा वदल कर उसे  संज्ञेय बना कर तत्काल  रिपोर्ट लिख लेंगी और कार्यवाही भी करेगी । यह व्यवस्था भी हमारे कानून में ही  मौजूद है ।  और अगर पुलिस नहीं चाहे तो  हमारे देश काप्रधान मनं्त्री ख़ुद भी पहचान छुपा कर  जाय तो उसे  भी अपनी F I R लिखाने में पसीने आ जायेंगे ।। 


मारपीट पर हाथ पैर टूट जाने फ़्रैक्चर होजाना धारा 325 IPC के तहत

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संज्ञेय अपराध  है पर  तब भी पुलिस F I R नहीं लिखेगी .... 

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  यदि ऐसी मारपीट में पीटने वाले के हाथ पैर टूट जाते हैं तब  पुलिस रिपोर्ट/F I R  लिखने के पहले मेडिकल रिपोर्ट का इतंजार करती है जो अक्सर 15 दिन से लेकर कई महीनों इंतज़ार करने बाद आती है । तब धारा 325 के तहत पुलिस F I R तो लिखती है लेकिन यह  अपराध पुलिस संज्ञेय होने के साथ ही अपराधी की सहायता के उद्देश्य से जमानतीय वनाया गया है जिससे  पुलिस  अपराधी को थाने पर ही , पिटने वाले के सामने ही उसे ज़मानत पर रिहा करने को वाध्य होती है । 


  पर पीड़ित व्यक्ति के साथ कानून  का उपहास  व उत्पीड़न यहीं नहीं रुकता  ...जारी रहता है ..... ...




इसी कानून के प्रावधानों केतहत


यदि अपराध संज्ञेय है तब भी  पीड़ित की रिपोर्ट नहीं लिखी जायेगी 

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  यदि दवंग आरोपी या राज्य सरकार  चाहती है  कि फरियादी की संज्ञेय रिपोर्ट पर भी F I R नहीं लिखी जाय  तब वह  फ़रियादी से आवेदन लिखवा कर लेने व जाँच करने के वहाने  रिपोर्ट को गदरबूद  कर दिया जाता है , जबकि CrPC में  शिकायत जाँच करने का अधिकार सिर्फ मजिस्ट्रेट को होता है । पुलिस को नहीं ।  पर राज्य सरकारें लाखों की संख्या में  FIR सिपाही से लेकर dGP तक जाँच करवा कर जुर्म को छुपाने व अपराधियों को बचाने में मशगूल है । 


  असमज्ञेय मामले में  न्यायालय में चारा जोई 

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 न्यायालय  किसी संज्ञेय या असंज्ञेय अपराध में  या आवेदन लेकर संज्ञान ले सकता है लेकिन  क़ानूनी प्रक्रिया यहाँ भी आरोपी की सहायता करने की मंशा से बनाई गई है । 

   न्यायालय में शिकायत कर्ता को पहले तो यह सिद्ध करना होता है कि शिकायत के समर्थन में पर्याप्त सबूत उसके पास हैं , फिर  न्यायालय कुछ  दिन महीने या कई साल सिर्फ जाँचने के वहाने न्यीलय के चक्कर कटवायेगी  और फ़रियादी यदि एक भी तारीख़ पर हाज़िर होने से चूक गया तो न्यायालय  उसका आवेदन ख़ारिज कर देगी । यह प्रावधान CrPC के तहत है । 

   

  पुलिस द्वारा विवेचना 

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                                के दौरान जो  भी साक्ष्य एकत्र की जाती तथ जिन गवाहों के कथन लिखें जाते है या  कोई वस्तु ज़ब्त की जाती हगिर्फ्तार अपराधी द्वारा जो स्वीकारोक्ति की जाती है  । या पुलिस द्वारा किसी अन्य सक्षम न्यायालय में किसी गवाह या मुलज़िम के धारा 264 CrPC के तहत कथन करवाये जाते है   वह सभी  पर साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों की बजह से न्यायालय उस पर विश्वास नहीं करती ।

        परिणाम स्वरूप पुलिस द्वारा विवेचना में जाया किया गये समय का कोई उपयोग  नहीँ होता और चार्ज सीट दाख़िल किये जाने  के बाद न्यायालय पुन:  उसी केस की आरम्भ से सुनवाईँ करती है । जिससे फ़रियादी  व गवाह रोज़ रोज़ न्याय के चक्कर काटते  हुये परेशान होकर या तो चुप होकर घर वैठ जाते है । या राजीनामा कर लेते है अथवा हताश होकर मुकर जाते हैं । या ज़िन्दगी मेंदुवारा पुलिस में रिपोर्ट न करने की व गवाही न देने की क़सम खा लेते है । इस प्रकार आरोपी के हित में सारी कार्यवाही हमारे कानून के तहत ही की जाती  है  ।  और आरोपी न्यायालय  से वरी  हो जाता  है । 

   सिविल  कानून की माया तो और भी विचित्र है । यहाँ अगर कोई लठैतो या पैसे वाला व्यक्ति सुखाधिकार के कानून के तहत  किसी की पत्नी  या सम्पति पर बल पूर्वक या किरायेगार आदि बन कर क़ब्ज़ा करके कई शताब्दी  तक उसका उपभोग करते हुये फ़रियादी  तथा उसकी कई पीढ़ियों को न्यायालय में पैसा ख़र्च करते रहने व चक्कर काटने को मजबूर कर सकता है । 

      उदाहरण १. बाबरी मस्जिद राम मंदिर केस आपके सामने ही है 

उदाहरण -२.    मेरी स्वयं का ज़मीन विवाद का केस जो मेरे  पर पितामह द्वारा सन् 1942 में ख़रीदी गई ज़मीन पर आरोपी पक्ष के अवैध क़ब्ज़ा कर लेने के विरुद्ध दायर किया गया था ।  जिसमें विगत 77 वर्षों में प्रत्येक न्यायालय का फ़ैसला हमारे हक़ में होने के बावजूद आरोपी पक्ष अब भी तीन पीढ़ियों से ज़मीन पर क़ाबिज़ होकर खेती कर रहा है और उसी से केस लड़ रहा है ।  और फ़रियादी पक्ष की तीसरी पीढ़ी  ज़मीन पर क़ब्ज़े की आश लिये संसार से विदा बोने की तैयारी में है ।


ऊपर दिये  गये उदाहरणों से मिलते जुलते अन्याय का पक्ष लेने वाले प्रावधान हर पुराने व नये भारतीय कानून का अंग वन चुके है जो सिर्फ अन्याय का पक्ष लेने के लिये वनाये गये है जिनका उपयोग कानून का पालन करने वाली शाँतिप्रिय जनता के खिलाफ अत्याचार  अनाचार व भ्रष्टाचार करने के लिये खुले आम किया जाता है । 


 कानून में रखे गये इन अन्याय परक क़ानूनों  व न्याय में होने वाली देरी को को बहुत छोटे व व्यवहारिक उपायों से दूर किया जा सकता है । मसलन । 

१. Law of accountability वना कर राष्ट्रपति से लेकर आम आदमी तक  को उनके द्वारा किये गये प्रत्येक कार्य के लिये पूर्णत: ज़िम्मेदार वनाया जाय तथा ग़लती करने पर  या ग़लत सूचना देने पर दोगुनी सज़ा के लिये विना ट्रायल तैयार रहने का क्शपथ पत्र लिया जाय ।  फ़रियादी व गवाहान से उनके कथनों पर हस्ताक्षर न करवाने का धारा 161 CrPC का प्रावधान ख़त्म किया जाय , जिससे जाँद एजेंसी द्वारा लिये कथन  व एकत्र साक्ष्य पर ही  न्यायालय  अपना फ़ैसला सुना सके । तो उसे  दुवारा विवेचना व कथन लेने की आवश्यकता नहीं रहेगी । गवाह को बार बार न्यायालय  के चक्कर नहीं लगाना होगा जिससे उसके होस्टाइल होने की संम्भावना समाप्त हो सकेगी 

  कानून की समस्त धाराओं को पुलिस हस्तक्षेप योग्य घोषित किया जाय । तथा रिपोर्ट के सच झूँठ का निराकरण F I R लिखने  के बाद ही क्या जाकर यथा स्थितिchalan , FR तथा ER रिपोर्ट भेज कर निराकृत किया जाय ।  

पुलिस   आवेदन जाँच करने  को  कठोरता से प्रतिबंध लगा कर दण्डनीय अपराध घोषित किया जाय ।  

एसे ही कुछँ वहुत ही सरल व व्यवहारिक उपाय है जो कानून में वहुत छोटे   संशोधन करके वर्तमान कानून को संविधान की आत्मा के अनुरूप न्याय परक वनाया जा सकता है ।  साथ ही आपसे प्रार्थना है कि यह कार्य अत :कानून विदों तथा कानून पीड़ित व्यक्तियों तथा रिटायर थाना प्रभारियों की  एक कमेटी बना कर ऐसे समस्त प्रावधानो को हटाकर सच्चे व संविधान की मंशा के अनुरूप कानून में सुधार किया जा सकता है 


 जिन्हें यदि आप उचित समझें तो मैं स्वयं  वह सारे सुझाव लिख कर भेजने या समक्ष में निवेदन करने के लिये भी सदैव तत्पर हूँ । सादर । 

 Vikram singh bhadoriya  (rtd) police inspector  m. P. Police Gwalior  1-8--2016 gwalior 

 

  

    

   

मंगलवार, 31 मई 2016

औरत का बजूद

एक और अकविता । 

औरत का बजूद ..
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औरत का बजूद ..
एक धान के पौधे सा 
उसे बोया किसी ने 
फिर उखाड़ कर रोपा किसी ने 
सींचा किसी नाशुकरे वटाईदार ने 
काटा लूना फिर कूटा 
तिनका तिनका ,भूसा, दाना 
अलग,    अलग 
 किया किसी ने ..... 
रूँधा ,       रांधा   ,पकाया  
खाया     किसी ने ...
फिर खो गया कहीं ,
उसका बजूद ....
जो था हमेशा से ही ,
नेस्तनाबूद..................! 

                  विक्रम सिंह भदौरिया 
...................30-5-2014......
Photo सौजन्य गूगल /faminismindia से साभार 

सोमवार, 30 मई 2016

संविधान के घोंघा वंसत तुम

हे संविधान के घोंघा वसंत 
शत शत नमन् 
टीप कर विश्व के सारे विधान 
 मोती मांण्डूक्य पत्थर कुसुम 
आरक्षण  के नव निधान 
काले अँग्रेजों को करके निहाल 
बाँटो खाओ का नया मंन्त्र
आरक्षण के नव निधान 
तुमसे हारे गाँधी महान 
ज़िंन्ना के हे पादत्राण  तुम 
दलितायन के महायान 
       K_vikramSingh



शुक्रवार, 20 मई 2016

Corrupt mining act grave consequences

आज  भ्रष्ट भारतीय खनिज अधिनियम ,वन अधिनियम कानून तथा  हरित प्राधिकरण गठजोड़ व इनके तहत वनाये गये क़ानूनी नियम उपनियम के  कारण ईमानदारी से  खनन करने वालों तथा ईमानदारी से रोज़ी रोटी कमा कर अपना घर बनाने का सपना देखने वाले आम जन का जीना दूर कर रखा है । सरकार ने इन नियमों के तहत मकान बनाने में काम आने वाली रेत गिट्टी पत्थर जैसे मूल भूत  उत्पादों के खनन व विक्रय पर घोषित रूप से पूर्ण रूपेण रोक लगा कर सारी खदानें बंद कर रखी हैं । अत: एक नम्बर में सारी प्रक्रिया पूर्ण करके न तो ठेकेदार ईमानदारी से खदान का संचालन कर सकता है और न जनता का कोई गरीब आदमी  अपना मकान बनाने के लिये  एक बोरी रेत ख़रीद सकता है लेकिन नेता मन्त्री व अधिकारियों की मुट्ठी गरम करके तथा मीडिया का हफ़्ता चुकाने के बाद खदान मालिक अपनी वैध खदानों से अवैध खनन कर सकता है तथा आम आदमी अपने ख़ून पसीने की कमांई से मूल क़ीमत का दस गुना भुगतान करके अपना मकान बनाने को रेत गिट्टी ब्लैक मार्केट से ख़रीद सकता है । लेकिन एक नम्बर में कदापि  नहीं । 
   यह स्थिति वेहद ख़तरनाक   है क्योंकि इसमें भ्रष्टाचार करने के लिये बाक़ायदा कानून है और कानून के तहत वनाये गये भ्रष्टाचारोन्मुखी नियम हैं जिनका इस्तेमाल  कानून निर्माता व उनके नौकर  वड़ी वेशर्मी के साथ विल्कुल नंगे होकर कर रहे हैं । उत्तर प्रदेश तथा म. .प्र. के जो हालात मेरी जानकारी में हैं वह  अंततः: सरकार व आम जनता के बीच गृह युद्ध या जय प्रकाश नारायण जैसे जन आन्दोलन का कारण बन सकते  है ।  अत: प्रधान मंन्त्री जी समय रहते कुछ उपाय कर लें तो अच्छा है बरना यहाँ  सारा दोष आपके मत्थे मढ़े जाने की पूरी तैय्यारी है । 
Vikram singh bhadoriya 
Gwalior M.P. 
21-5- 16 

गुरुवार, 5 मई 2016

एक अकेला आदमी

 उँ  "नमो " भगवते वासुदेवा: 

एक अकेला आदमी 
चला जा रहा है 
बोझा उठाये ,अनवरत  ,अथक 
 साथ सवा अरब 
कुछ उमंग भरे युवा 
कुछ बोझिल और अपाहिज, 
कुछ सिरफिरे अहँकारी प्रेतों की 
बदबूदार लाशें,
उठाये हुये 
उसके वह दृढ़ स्कंध 
दृढ़ संकल्प लिये 
चल रहा है वो
अनवरत 
विना थके विना रुके 
पाँव दर पाँव 

कुछ देश द्रोही समाज कंटक भी हैं ,
यहाँ 
जो उग आये हैं पाँव में ,  छालों की तरह ,
पीर वन कर 
एक मूर्ख मण्डल पार्टी की वेड़ियाँ भी हैं 
साथ में 
बँधे हुये घायल पाँव लिये 
चला जा रहा है 
वो अकेला अहर्निश 

न पास कोई छाँव है 
न पास कोई ठाँव है 
न साथ  कोई साथी है 
कुछ महा मूर्खो के सिवा 

बस एक ज़िद है 
एक ज्योति  है ,जो 
अहर्रनिश ज्वाजल्यमान 

दिल में 
एक चाहत है ,एक टीस सी 
जो  उठती है 
रह रह कर 
एक हूक बन कर 


पतन के गर्त में 
डूबे हुये भारत को 
स्वाभिमान व सफलता के
 स्वर्णिम उज्जवल शिखर तक
खींच ले जाने की 
एक चाहत ,निर्विकल्प । 
    ---k_vikramsingh

Re edited on 15-5-2016 
DRPL GWL posted on 19-9-2017



बुधवार, 16 मार्च 2016

औरत का बजूद

एक और अकविता । 

औरत का बजूद ..
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औरत का बजूद ..
एक धान के पौधे सा 
उसे बोया किसी ने 
फिर उखाड़ कर रोपा किसी ने 
सींचा किसी नाशुकरे वटाईदार ने 
काटा लूना फिर कूटा 
तिनका तिनका ,भूसा, दाना 
अलग,    अलग 
 किया किसी ने ..... 
रूँधा ,       रांधा   ,पकाया  
खाया     किसी ने ...
फिर खो गया कहीं ,
उसका बजूद ....
जो था हमेशा से ही ,
नेस्तनाबूद..................! 

                  विक्रम सिंह भदौरिया 
...................30-5-2014......

मंगलवार, 8 मार्च 2016

काव्योदय केपृष्ठ पर

विश्व नारी दिवस पर काव्योदय के पीठ पर लिखी एक अकविता ... 

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मातृ सत्ता की गरिमा का असर 

राम की सरपरस्त वन करती वसर, 

कृष्ण की माँ बनने तक का सफर , 

वो कौशल्या नंदन वो यशोदा का पुत्तर 

राम की वो शक्ति पूजा 

वो महिषासुर     मर्दिनी 

वो अर्ध नारीश्वर  शिवा 

वो शिव की अर्धांगिनी 


 वो सीता केअनुगामी सीताराम 

वो राधे के  अनुगामी राधेश्याम 

कहाँ गये सब 

कहाँ गया वह गौरव , 

वो राह में कब रुकी 

वो राह में कब थकी 

कि ठाँव ठाँव गई छली 

 रह गई पीछे वो सदी सदी 

निकल गया आगे 

सीता का श्री राम वह

राधा का घनश्याम वह  

कहाँ और कब छली गई वो 

राधा छलिया कृष्ण से 

सीता सनातन  पुरूष दम्भ से 

जुये में नीलाम पाँचाली की अस्मिता

तार तार अंत: वस्त्र , 

तार तार स्वाभिमान 

पाँडु पुत्रों की अनुगामनी 

बनने की सज़ा 

भुगतती वो मानिनी 

अग्नि दग्धा कोख से उत्पन्न वो 

दीप शिखा ज्वाजल्यमान 

स्वयं पराजिता आज वह अपराजिता 

किस से कहे अाज वह निज व्यथा  

उसे तो बस अपनों ने ही छला । vikram singh bhadoriya 

8-3-2016 

Bhind


बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

बगुला के पँख

बगुला के पँख पहन कर 
निकल आये है 
झुंड के झुंड 
राजनीति के ज़हरीले वरसाती कीड़े 
कुछ वीर वहूटी सी 
तिरछी  लाल टोपियाँ 
कुछ लाल दुपट्टे भी 
बरगला रहे है, 
नई पीढ़ी के बच्चों को 
सिखला रहे हैं राष्ट्र द्रोह 
कुछ भी कहने की आजादी 
भारत माता को गाली भी ....!
नाच रहे हैं, 
रक्त पिपासु भेड़िये 
खड़रम् खड़रम् 
राष्ट्र भक्ति का मांस नौचते गिद्ध 
से कैसी आज़ादी है ? 
मीर जाफ़र ,जयचंदों को 
पीठ पर छुरा भौंकते 
ब्रुटस , और 
अरण्य रुदन करती 
माँ भारती ! 

  विक्रम सिंह भदौरिया 
 १८-२-२०१६ बुधवार ,ग्वालियर 

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

मधु मय वसंत

स्वागत सुखकर मधुमय वसंत ।
उसने कहा था मैं मिलूँगा 
फूलों में ,कलियों में , 
लहलहाती  अमराइयों मैं ,
प्रेमी के ह्दय की अतल गहराइयों में ,
बचपन की खिलखिलाती निश्छल हँसी मैं ,
क्योंकि मैं प्रेम हूँ , 
जो हर वार 
छले जाने के बाद  भी
 लौट आता हूँ  ,
पुन: पुन: धोखा खाने के बाद भी , 
एक बार फिर 
छले जाने की बाट मैं ..... 
स्वागत सुखकर मधुमय वसंत ....

विक्रम सिंह भदौरिया 
वसंतोत्सव 14फरवरी 2014 

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

क़यामत है

मार डाला है उन्होंने ख़ुदा को ,

मस्जिद में वैंठ् कर शैतान गा रहा है । 

वीर है हनुमंत है मृत्यु शय्या पर 

अफ़ज़ल कब्र से उठ कर 

दिल्ली पै छा रहा है । 

क़यामत है 


ओढ़ कर कफ़न वर्फ का वो वीर सो गये 

आस्तीनो में पला  तक्षक जीभ लपलपा रहा है  

कश्मीर से काशी तक कसाव ही कसाव है 

दिल्ली में गीदड़ खयाल गा रहा है 

क़यामत है 


पी कर ख़ून ग़रीबों का ,होंठ हुये है लाल लाल 

वे पैंदी का लोटा दलित की लाश पर आरक्षण गा रहा है 

किसान की कमाईँ पर मुटियाया हुआ है वो 

दाल पर प्याज़ पर मँहगाई गा रहा है 

क़यामत है 

क्या करें कोई ,जो बागड़ ही खेत खाये 

हमारे ही बोट पा कर हमें ही लतिया रहा है 

आकाओं ने विछाई थी विसात ग़ुलामों के लिये 

वो उस पर बैठ कर  हमें ही कानून सिखा रहा है 

क़यामत है 

  विक्रम सिंह भदौरिया  १२-२-२०१६

  शुक्रवार ,ग्वालियर