भारत में सड़क दुर्घटना के सिर्फ दो ही कारण हैं एक है -- मानवीय त्रुटि और
दूसरी -- तकनीकी त्रुटि
भारत की सारी यातायात व्यवस्था सिर्फ पुलिस के ज़िम्मे है लेकिन उसके पास इन दो त्रुटियों में से एक को भी दूर करने का न तो कोई अधिकार है और न ही कोई साधन है ।
प्रथम त्रुटि--है
मानवीय त्रुटि
जो कि सीधे ९५% दुर्घटनाओं के लिये ज़िम्मेवार है को ठीक करने के दो उपाय हैं
एक --उपाय है चालकों को मानक ट्रेनिंग स्कूल्स में प्रशिक्षण . अनिवार्य किया जाना ..लेकिन पूरे भारत में क़रीब 24 करोड़ वाहन चालकों के लिये एक भी ऐसा स्कूल आज तक शासन द्वारा स्थापित नहीं किया गया,
जहाँ से यह लोग डिग्री या डिप्लोमा ट्रेफ़िक लाॅ फ़र्स्ट एड एण्ड ड्रायविंग में हासिल कर सकें । लेकिन आम जनता तो दूर पुलिस के पास भी एसे स्कूल्स नहीं हैं जहाँ वो उपरोक्त प्रकार से ट्रेनिंग ले सकें ।
दो -- दूसरा उपाय मानवीय त्रुटि को सुधारने का है बुद्धिमत्ता पूर्वक बनाया गया पूर्णत: व्यवहारिक कानून,
लेकिन , वर्तमान यातायात नियम आम वाहन मालिक का आर्थिक शोषण करके शासन का ख़ज़ाना भरने के एक मात्र उद्देश्य की पूर्ति के लिये बनाये गये हैं । जिसमें अभी हाल में गडकरी साहब द्वारा प्रस्तावित यातायात नियमों के उल्लंघन पर बढ़ायें हुये अर्थ दण्डों को पढ़कर लगता है जैसे किसी मुंगेरी लाल ने शासकीय ख़ज़ाना भरने का हसींन सा सपना देखा हो ..! पर इससे सिर्फ भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलने के अलावा ईमानदारी से काम करने वाले आम जन और ईमानदार पुलिस अधिकारियों का विभाग में जीना हराम हो जाना भी तय है । ---
तकनीकी त्रुटि :-
__________ जो लगभग 5% सड़क दुर्घटनाओं के लिये ज़िम्मेवार ठहराई जा सकती है वह है तकनीकी त्रुटि यानि वाहन की ख़राबी या रोड की ख़राबी ।
जहाँ तक वाहन की तकनीकी ख़राबी का प्रश्न है नई समुन्नत तकनीक वाले वाहनों के बाज़ार में आ जाने से हालत में काफ़ी सुधार हुआ है लेकिन यातायात कानून के फिसड्डी होने के चलते बाहन शोरूम से बाहर जाने के बाद उसकी फ़िटनेस चैक करने का कोई नया सिस्टम डेवलप नहीं हो पाया है ... हाँ एक मूर्खता पूर्ण संशोधन यह ज़रूर हुआ है कि वाहन की उम्र ख़रीदें जाने के दिन को उसका जन्म दिन मान कर १५ साल नियत कर दी गई है । लेकिन १५ साल पुराने सिर्फ शासकीय वाहनों को जनता को बेच कर उनसे दुर्घटना करवाने का एक और ज़रिया खुल गया है वस ।
तकनीकी त्रुटि से दुर्घटना होने का एक अन्य कारण है
ख़राब सड़कें , :-
सेंन्ट्रीपीटल और सेंन्ट्रीफ्यूगल फ़ोर्स को ध्यान में न रख कर बनाये गये मोड़ और सड़क निर्माण विभाग का वाहन चालकों व आम जनता के नुकसान के प्रति जबाब
उपाय ---
जहाँ तक ट्रेनिंग का प्रश्न है , इसकी व्यवस्था विना शासन का एक धेला ख़र्च किये बग़ैर सिर्फ कानून में मानडेटरी प्रोविजन करके की जा सकती है ...कि शहर में जितनी भी कम्पनियों के रिटेल शो रूम हों प्रत्येक कम्पनी कमसे कम एक ट्रेनिंग स्कूल स्वयं का उस शहर में अनिवार्यत: खोलेगी , जिसमें ड्रायविंग सीखने बाले को ड्रायविंग के अलावा वाहन का तकनीकी प्रारथमिक ज्ञान तथा फ़र्स्ट एंड और यातायात कानून के साथ ही मैकेनिक की ट्रेनिंग की व्यवस्था अनिवार्य कर वाहन ख़रीदने के पूर्व इन स्कूल्स की डिग्री दिखाना भी अनिवार्य किया जाना चाहिये । साथ ही ट्रेफ़िक पोलिस में भर्ती के लिये भी इन स्कूलों की डिग्री अनिवार्य हो ।
शासन सिर्फ इन स्कूलों को जगह दिलाने और क्वालिटी कन्ट्रोल के अलावा अन्य कोई हस्तक्षेप न करे ।
यातायात के नियमों में नई तकनीक के कारण बहुत विद्वान हुये हैं ,अत: इसकी शिक्षा प्रायमरी स्कूल से लेकर उच्च कक्षाओं तक में अनिवार्य की जाय ।
RTO विभाग को सिर्फ जनता से पैसा वसूलने वाला विभाग की जगह जनता के यातायात सुख दु:ख के प्रति जबाब देह वनाया जाय ।
साथ ही साथ देश के सारे RTO office तथा
हैल्म्ेट और सीट वैल्ट के चालान में दण्ड राशि बढ़ाने के बजाय इन्हें सीधा वीमा पाॅलिसी से लिंक किया जाय , ताकि विना हैल्म्ेट ड्रायविंग के दौरान दुर्घटना होने पर वाहन चालक को वीमा राशि भुगतान की पात्रता न रहे ।
इसके अलावा पुलिस के पास नई तकनीकी दक्षता के उपकरण दिये जाकर हैमलेट और सीटबैल्ट और ओवर लोडिंग के बजाय यातायात को प्रभावित करने वाले यानि कि ग़लत साइड से ओवर टेक , रास ड्रायविंग , ग़लत पार्किंग , डुपर का उपयोग न करने या ग़लत उपयोग करने के यातायात नियमों के उल्लंघन पर वाहन चालान वना कर वसूली करने के साथ ही चालान किये गये ब्यक्ति को यह भी लिख कर देना चाहिये कि उसने क्या ग़लती की थी और उसे क्या करना चाहिये था । ताकि चालान वनाने का मूल उद्देश्य पूरा हो सके ।और साथ ही ट्रेनिंग भी चलती रहे ।
